आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Main Inka Mureed ›   nazir akbarabadi a biggest democratic shayar from the ancient india
nazir akbarabadi a biggest democratic shayar from the ancient india

मैं इनका मुरीद

नज़ीर अकबराबादी से बड़ा डेमोक्रेटिक कैनवास किसी शायर के पास नहीं

संजय अभिज्ञान, नई दिल्ली

872 Views
'क्या शक्कर, मिसरी, कंद, गरी क्या सांभर मीठा खारी है
क्या दाख, मुनक्का, सोंठ, मिरच, क्या केसर, लौंग, सुपारी है
गर तू है लक्खी बंजारा और खेप भी तेरी भारी है
ऐ ग़ाफिल तुझसे भी चढ़ता इक और बड़ा व्यापारी है
               सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा'

'टुक हिर्सो-हवा (लालच) को छोड़ मियां, मत देस-बिदेस फिरे मारा
कज्जाक़ अजल का (मौत का डाकू)  लूटे है दिन रात बजाकर नक्क़ारा 
क्या बघिया, भैंसा, बैल, शुतुर, क्या गौनें पल्ला सर भारा
क्या गेहूं, चावल, मोठ, मटर, क्या आग, धुआं और अंगारा
            सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा'


एक अकेली नज्‍़म में हजार चीजों की खबर देने वाले ये शब्दचित्र आगरा के शायर वली मुहम्मद के हैं जो बाद में नज़ीर अकबराबादी के नाम से मशहूर हुए। वही नज़ीर अकबराबादी जिनके सिर पर दुनिया की पहली नज़्म लिखने का ताज है और जिनके बारे में कहा जाता है कि उनके काम को उनकी मौत के सौ साल बाद पहचाना गया। 

हिंदुस्तान की अब तक की काव्य यात्रा को अगर कुछ देर के लिए सोशियो-पॉलिटिकल तराजू में रख दें और यह पूछें कि खुसरो, कबीर, रहीम और जायसी के बाद कौन सा सबसे बड़ा डेमोक्रेटिक कवि या शायर हुआ तो सिर्फ और सिर्फ एक नाम जेहन में  उभरेगा --- नज़ीर अकबराबादी। 

बात कुछ अजीब लगती है। हिंदुस्तानी अदब के इतिहास में एक से बढ़कर एक वामपंथी शायर हुए हैं जिन्होंने मजदूर, सर्वहारा और आम जनता के नाम अपना काम कुर्बान किया। बीसवीं सदी में तो जैसे कम्युनिस्ट पार्टी का मेंबरशिप कार्ड होना ही महान शायर होने की निशानी था। तो फिर सबसे डेमोक्रेटिक होने का तमगा अठारहवीं शताब्दी के नजीर को क्यों, जिसने अपनी शायरी में कभी किसी बगावत या जनक्रांति की बात नहीं की? इस सवाल का जवाब नज़ीर अकबराबादी का कलाम पढ़े बिना नहीं समझा जा सकता। या फिर जिन खुशनसीब लोगों को रंगकर्मी स्वर्गीय हबीब तनवीर की कालजयी संगीत नाटिका `आगरा बाजार` देखने-सुनने का मौका मिला है, वे भी बखूबी जानते हैं कि हिंदुस्तानी अदब के सफर में किस तरह जम्हूरियत का सबसे साफ चेहरा नज़ीर अकबराबादी के वजूद में उभरता है। 
 
जम्‍हूरियत या डेमोक्रेसी की सबसे आसान और मशहूर परिभाषा क्या है? जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा शासन--यही ना? लगभग 90 बरस की अपनी उम्र में दो लाख शेरों, दो दीवान और नौ फारसी गद्य पुस्तकें लिखने वाले नज़ीर के कुल जमा काम को भी इतने ही आसान मायनों में समझाया जा सकता है --- जनता के लिए, जनता की और जनता के द्वारा कविता। जन-जन के विषयों पर, जन-जन के लिए लिखा गया काव्य।  जो एक ऐसे शख्‍स के हाथों लिखा गया जो हमेशा आम जनता के बीच साधारण इंसान की तरह जिया और जिसने न जाने कितने नवाबों- बादशाहों की दरबारी कवि बनने की पेशकश ठुकरा दीं। 
  आगे पढ़ें

नज़ीर के कलाम और उनके लेखन के रूपक आम आदमी की जिंदगी के करीब थे

Comments
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!