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harivansh rai bachchan a memorable hindi poet on amar ujala kavya

मैं इनका मुरीद

​हरिवंश राय बच्चन: ख़्वाहिश नहीं मुझे मशहूर होने की...

मुकेश झा, नई दिल्ली

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'ख़्वाहिश नहीं मुझे मशहूर होने की।
आप मुझे पहचानते हो बस इतना ही काफी है।
अच्छे ने अच्छा और बुरे ने बुरा जाना मुझे।
क्योंकि जिसकी जितनी ज़रूरत थी उसने उतना ही पहचाना मुझे।
ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा भी कितना अजीब है,
शामें कटती नहीं, और साल गुज़रते चले जा रहे हैं....!!'


उपरोक्त पंक्तियां प्रखर छायावाद और आधुनिक प्रगतिवाद के प्रमुख स्तंभ माने जाने वाले महान कवि डॉ हरिवंशराय बच्चन की है। वैसे तो हमारे देश में विद्वानों और कवियों की कमी नहीं है। एक से एक प्र‌तिभाशाली कवि और लेखक देश में हैं। लेकिन बच्चन की कुछ अलग ही ख़ासियत थी। अपने सीधे सरल शब्दों को कविता में पिरोकर साहित्य रसिकों को 'काव्य रस' देने वाले हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि डॉ. हरिवंश राय ने देश में अलग पहचान बनाई। उनकी कविता की लाइनें इतनी रसिक और मार्मिक होती थी कि आम जनमानस के ह्रदय को अवश्य छूती थी। उक्त चंद लाइनें शायद यही बयां करती हैं। सबसे ऊपर लिखी पंक्तियों का यही तात्पर्य है कि बच्चन को शायद मशहूर होने का शौक नहीं था। वो सहज और सरल स्वभाव के थे। 

उनका ये कहना था कि मैं मशहूर होना नहीं चाहता हूं, मेरे लिए इतना ही काफी है कि आप मुझे पचानते हैं। ज़रूरत और समझ के हिसाब से लोग लोगों को पहचानते हैं। इस छोटी सी ज़िंदगी में वक्त ही कितना होता है। यहां तो देखो शाम कट नहीं रही और साल दर साल गुजरते चले जा रहे हैं।

'एक अजीब सी दौड़ है ये ज़िन्दगी,
जीत जाओ तो कई अपने पीछे छूट जाते हैं,
और हार जाओ तो अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं।
बैठ जाता हूं मिट्टी पे अक्सर...
क्योंकि मुझे अपनी औकात अच्छी लगती है..
मैंने समंदर से सीखा है जीने का सलीक़ा,
चुपचाप से बहना और अपनी मौज में रहना।।'


हरिवंश राय बच्‍चन की यह पंक्तियां आज भी काव्यप्रेमियों या कविता की चाह रखने वालों के जुबान पर है। उनकी लिखी कविता आज भी लोगों के ज़ेहन में बसी है। उनकी कविताएं बताती हैं कि ज़िंदगी भी एक अजीब दौड़ है। यहां मानो तो सब अपने हैं और सब पराये। इस ज़िंदगी में मौकापरस्त लोगों की कमी नहीं है। यहां ख़ास अपने पराये हो जाते हैं और पराये अपने होने का दर्द दे जाते हैं। ज़िंदगी की आम सच्चाई को उन्होंने बयां करते हुए लिखा है कि यहां जीतने वालों की चाह होती है। इस कश्मकश भरी ज़िंदगी में यदि जीत जाओ तो कई अपने पीछे छूट जाते है और यदि हार जाओ तो वहीं अपने ख़ास बनने की चाह रखने वाले पीछे छोड़ जाते हैं। 

बच्चन जमीन से जुड़े हुए इंसान थे और वो जमीनी हकीकत से रू-ब-रू होना और अपनी औकात को पहचानना  ज़रूरी समझते थे। इसलिए उन्होंने आगे की पंक्ति में लिखा है ज़िंदगी में समंदर की तरह मैने सीखा है जीने का सलीक़ा क्योंकि समंदर अपनी मौज में रहता है और चुपचाप से बहता है। 

ऐसा नहीं है कि मुझमें कोई ऐब नहीं है पर सच कहता हूं मुझमे कोई फरेब नहीं है
जल जाते हैं मेरे अंदाज़ से मेरे दुश्मन क्यूंकि एक मुद्दत से मैंने न मोहब्बत बदली और न दोस्त बदले..!!
एक घड़ी ख़रीदकर हाथ मे क्या बांध ली..
वक़्त पीछे ही पड़ गया मेरे..!!
सोचा था घर बना कर बैठूंगा सुकून से..
पर घर की ज़रूरतों ने मुसाफ़िर बना डाला !!!
सुकून की बात मत कर ऐ ग़ालिब....
बचपन वाला 'इतवार' अब नहीं आता...

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