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मैं इनका मुरीद

शरद का यौवन बूढ़ी वर्षा

Ghanshyam Bairagi

19 कविताएं

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यौवन का सुख
शरद ऋतु पर,
बूढ़ी वर्षा
थके-थके तब।

अंहकार
गर्जत बादल पर,
बूंद-बूंद बस
ओस टपकावे ।

जो गर्जत-बर्सत
डर लागे,
आज वही बस
बूंद टपकाये ।
बुढ़ी
वर्षा-ऋतु
सुंदर भाये,
साथ जब अपने
यौवन लाये ।

शरद का यौवन
शब्द बिछोह,
क्यों चकवा के
मन तरसावे ।

सुंदर
शिशिर-शरद की रंगत,
त्योहारों से सेहरा बाँधे ।

गई दीवाली
छठ की रौनक,
अब तुलसी के
विवाह रचा ले ।

बस अब रौशन
इंतजार कर,
धूल-धुलेड़ी
फाग-होली लाये ।।

- घनश्याम जी.बैरागी
  नंदिनी-भिलाईनगर
  छत्तीसगढ़

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