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Aasman par udate dekha

मैं इनका मुरीद

आसमान पर उड़ते देखा

Ghanshyam Bairagi

21 कविताएं

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☆ आसमान पर उड़ते देखा ☆

उड़ते देखा आसमान पर
उन पंछी बालाओं को हमने,
चौकड़ी भर ली जब भी
उड़ने की गति थम न पाई ।

पंछियों के इन झुण्डों से सीखा
कैसे चलें हम मिलजुल भी,
पर कैसी यह झुण्ड बन गई
चले अकेले सब अपने रंग में ।

केसरिया तो अपने रंग हैं
शांति सफेद फैलाते जग में,
एक स्तंभ अशोक चक्र का
हरा रंग हरियाली को भर दे ।

कहां गया यह रंग तिरंगा
हर कोई लेकर कस्मे खाते,
भ्रष्टाचार को दूर करेंगे
मिल गई सत्ता भूला दे सबकुछ ।

इससे अच्छे तो ये पंछी हैं
रंग-बिरंगे दिखते भी हैं,
नहीं लोभ-लालच है इनको
फिर भी मिलकर उड़ते ऐसे हैं ।

उड़ने दो इन पंछियों को
आसमान इनका ही है,
यह मानव तो जमीं संभालें
छोड़ गंदगी साफ सुथरे।

गंदगी तो मन में बसी है
साफ जिनको यह बना लें,
फिर तो हो जायेगी धरती
साफ और हरी-भरी सी ।

चल सकें तब बच्चे अपने
बेखौफ पंछी बालाओं की तरह,
स्वच्छंद ऐसा हो जमीं भी
आसमानी नीर की तरह ।

हरियाली तब आ जायेगी
सरजमीं सजे केसरिया,
जैसे मिलजुल कर हम पंछी
आसमान पर उड़ते देखा ।।

- घनश्याम जी.बैरागी


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