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Famous Urdu poet Ibne Insha is also great humorists novelist and  travelogue writer

मैं इनका मुरीद

इब्ने इंशा : वो लड़की थी जो चाँद नगर की रानी थी

रत्नेश मिश्र, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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सब माया है
सब माया है, सब ढलती-फिरती छाया है 

इस इश्क़ में हमने जो खोया या पाया है 
जो तुमने कहा है फ़ैज़ ने जो फ़रमाया है 
सब माया है, सब माया है, सब माया है

वो लड़की थी जो चाँद नगर की रानी थी
वो जिसके अल्हड़ आँखों में हैरानी थी
आज उसने भी पैगाम यही भिजवाया है 
सब माया है... सब माया है 

जो लोग अभी तक नाम वफ़ा का लेते हैं 
वो जान के धोके खाते, धोके देते हैं 
हाँ ठोक-बजा कर हम ने हुक्म लगाया है 
सब माया है 


ये नज़्म है इब्ने इंशा की, इसे गाया है अताउल्ला खां साहब ने। 'इंशा' ने शायरी के प्रचलित तौर-तरीकों से अलग अपनी रचनाओं के एक नया सौंदर्य-बोध ईजाद किया। सब माया है, सब ढलती-फिरती छाया है जैसा फ़कीरी अंदाज 'इंशा' के यहाँ ही संभव है। 'इंशा' अपने आप में एक अलहदा शायर और कवि थे जो 'कबीर' और 'नजीर' की परम्परा से आते हैं। इसीलिए उनकी कविताओं-नज़्मों में मिट्टी की वो खुशबू आती है जो अमूमन पहली बारिश के बाद उठती है। उनके कलाम में स्वयं को तलाश सकते हैं। दुनिया के विविध रंगों को वे अपनी कविताओं में बड़े बारीकी से ढाल लेते हैं।

सावन-भादों साठ ही दिन हैं फिर वो रुत की बात कहाँ 
अपने अश्क मुसलसल बरसें अपनी सी बरसात कहाँ 

चाँद ने क्या-क्या मंज़िल कर ली निकला, चमका, डूब गया 
हम जो आँख झपक लें सो लें ऐ दिल हमको रात कहाँ 

पीत  का कारोबार बहुत है अब तो और भी फ़ैल चला 
और जो काम जहां को देखें, फुरसत दें हालात कहाँ  


'चाँद' उनकी कविताओं में कई जगह आता है, असल में इंशा बिम्बों के कवि हैं, चाँद उनका प्रिय प्रतीक है। 'चाँद' के ज़रिए वे बहुत सी बातें कह जाते हैं। 'कातिक का चाँद' उनकी अद्भुत कविता है। इब्ने इंशा की शायरी में ज़बान का अलग चटख़ारा होता है, एक अल्हड़पन होता है, जैसे कोई अल्हड़ नदी अपने आप में मस्त, बेपरवाही बह रही हो। 

फ़र्ज़ करो हम अहले वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों
फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूठी हों अफ़साने हों

फ़र्ज़ करो ये जी की बिपता, जी से जोड़ सुनाई हो
फ़र्ज़ करो अभी और हो इतनी, आधी हमने छुपाई हो

फ़र्ज़ करो तुम्हें ख़ुश करने के ढूंढे हमने बहाने हों
फ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे सचमुच के मयख़ाने हों

फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा, झूठी पीत हमारी हो
फ़र्ज़ करो इस पीत के रोग में सांस भी हम पर भारी हो

फ़र्ज़ करो ये जोग बिजोग का हमने ढोंग रचाया हो
फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त बाक़ी सब कुछ माया हो


गुलाम अली, आता उल्ला खां ने इंशा की गजलों को खूब गाया। इंशा मनुष्य की स्वाधीनता और स्वाभिमान के पक्षधर थे वक़्त की नब्ज को बड़ी बारीकी से देखने-पहचानने वाले शायर थे।  

देख हमारे माथे पर ये दश्त-ए-तलब की धूल मियाँ 
हम से अजब तेरा दर्द का नाता देख हमें मत भूल मियाँ 

अहल-ए-वफ़ा से बात न करना होगा तिरा उसूल मियाँ 
हम क्यूँ छोड़ें उन गलियों के फेरों का मामूल मियाँ 

यूँही तो नहीं दश्त में पहुँचे यूँही तो नहीं जोग लिया 
बस्ती बस्ती काँटे देखे जंगल जंगल फूल मियाँ 

ये तो कहो कभी इश्क़ किया है जग में हुए हो रुस्वा भी? 
इस के सिवा हम कुछ भी न पूछें बाक़ी बात फ़ुज़ूल मियाँ 


उनकी नज्मों और कविताओं में सादगी झलकती रहती है, यही कारण है कि जो भी उन्हें पढ़ता है, खिंचा चला आता है। अपने अंदाज-ए-बयां के लिए भी इंशा मशहूर हुए। इंशाजी ख़ामोशी को ज़बान देने वाले शायर थे।  

ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं
तुम इंशा जी का नाम न लो, क्या इंशा जी सौदाई हैं ?

हैं लाखों रोग ज़माने में, क्यों इश्क़ है रुसवा बेचारा
हैं और भी वजहें वहशत की, इन्सान को रखतीं दुखियारा
हाँ बेकल -बेकल रहता है, हो पीत में जिसने जी हारा
पर शाम से लेकर सुबह तलक, यूँ कौन फिरे है आवारा ?
ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं
तुम इंशा जी का नाम न लो, क्या इंशा जी सौदाई हैं ?

वो लड़की अच्छी लड़की है तुम नाम न लो हम जान गए
वो जिसके लाँबे गेसू हैं पहचान गए पहचान गए
हाँ साथ हमारे इंशा जी उस घर में थे मेहमान गए
पर उससे तो कुछ बात न की अनजान रहे अनजान गए
ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं
तुम इंशा जी का नाम न लो, क्या इंशा जी सौदाई हैं ?
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