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birthday special: Ruins house of Shakeel Badayuni

मैं इनका मुरीद

खंडहर हो चुकी है शकील बदायूंनी की ‘शकील मंज़िल’

राजीव शर्मा/अमर उजाला, बदायूं

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शकील साहब ने भले ही अपने गीतों और शेरों से दुनिया में उत्तर प्रदेश के बदायूं का नाम रोशन किया हो। लेकिन उनके घर ने उन्हें बेगाना कर दिया। वैदोटोला के एक टूटे फूटे पुराने से मकान के एक कोने में हाथ से लिखी पट्टिका ‘शकील मंजिल’ उनके घर का पता देती है। तीन अगस्त 1916 को शकील साहब यहीं जन्मे थे। अफसोस कि उनकी विरासत का अब कोई पुरसानेहाल नहीं। 

ग़म की दुनिया रहे आबाद 'शकील'
मुफ़लिसी में कोई जागीर तो है

शकील साहब की शायरी का तसव्वुर इसी शहर में पैदा हुआ। लेकिन यहां सब बिखरा पड़ा है। शकील मंजिल के दूसरे गेट पर बैठे उनके भांजे मुजाहिद मजीद बताते हैं कि 1941 में दिल्ली के सप्लाई विभाग में नौकरी करने जाने से पहले शकील साहब उनके पिता यानि अपने बहनोई शादाब बदायूंनी को यह मकान दे गए थे। इसके बाद शकील साहब फिल्मों के गीत लिखने के लिए दिल्ली से मुंबई चले गए और फिर वहीं के होकर रह गए।

दिल के बहलाने की तदबीर तो है
तू नहीं है तिरी तस्वीर तो है

उनके इस मकान में शादाब बदायूंनी रहे और फिर उनके इंतकाल के बाद उनके बच्चे और नाती पोते इस घर में रह रहे हैं। शकील साहब फिर कभी इस घर में नहीं लौटे। शकील साहब के दो बेटे जावेद शकील और तारिक शकील वहीं मुंबई में रहते हैं। वे भी कभी बदायूं नहीं आए। शकील साहब के तीन बेटियां हैं, उनके ब्याह हो गए लेकिन उनमें से भी कोई शकील साहब के इस वीरान पड़े मकान को देखने नहीं आई। बदायूं के ही शायर शफीक अहमद कहते हैं कि वे लोग भी शकील बदायूंनी को अपने शहर में भूले हुए हैं, जो बाहर जाकर शकील साहब के नाम पर खुद भी इज्जत पाते हैं। 

काफ़ी है मिरे दिल की तसल्ली को यही बात
आप आ न सके आप का पैग़ाम तो आया

अभी महफूज़ है शायरी की पहली किताब 
शकील बदायूंनी के बहनोई शादाब बदायूंनी भी शायर थे। जब शकील साहब के गीत गूंजने लगे तो शादाब बदायूंनी ने इस मकान में लाइब्रेरी बनाई। बदायूं लाइब्रेरी का पुराना सा बोर्ड जर्जर हो चुके इस मकान के दरवाजे पर टंगा हुआ है लेकिन मकान के अंदर जिस कमरे में कभी यह लाइब्रेरी हुआ करती थी उसमें अब मुशाहिद रहते हैं। लाइब्रेरी के नाम पर 30-40 पुरानी किताबें इस कमरे की ऊपरी दराजों में रखी हुई हैं लेकिन इन्हें संवारने और पढ़ने वाला कोई नहीं है। किताबों में रखी एक बेहद पुरानी किताब दिखाते हुए शकील बदायूंनी के भांजे मुशाहिद मजीद बताते हैं कि यह शकील साहब की शायरी की पहली किताब है। उनके उर्दू में लिखे कुछ पत्र भी यहां महफूज हैं। मजीद बताते हैं कि लाइब्रेरी के लिए सरकारी अनुदान मांगा था। मिल जाता तो इसे संवार देते।

ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यूं आज तिरे नाम पे रोना आया

प्रतिमा लगी लेकिन दिखती नहीं
नगर पालिका परिषद की ओर से शकील साहब के लिए दो काम किए गए। पहला शहर में लालपुल से मीरा जी चौकी तक जाने वाले रोड का नाम शकील बदायूंनी मार्ग कर दिया गया। दूसरा-शहर में घंटाघर पर स्थित पार्क में शकील बदायूंनी की प्रतिमा लगाई गई। उनके भांजे मुशाहिद का पुत्र दानिश बताता है कि पहले जो प्रतिमा लगाई गई थी वह उनके वास्तविक चेहरे से भिन्न थी, इसलिए पालिका ने पिछले वर्ष दोबारा प्रतिमा बनवाकर लगाई। यह प्रतिमा लगाई तो गई है लेकिन इसके आसपास इतना अतिक्रमण है कि प्रतिमा दिखाई ही नहीं देती।

अपनों ने नज़र फेरी तो दिल तू ने दिया साथ
दुनिया में कोई दोस्त मिरे काम तो आया

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