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ten best heart touching sher of urdu

काव्य चर्चा

इश्क़ और हक़ीक़त को बयां करती शायरी

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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दिल के हालात और एहसासात को अल्फ़ाज़ के सांचों में ढालना हो, तो उर्दू ज़बान के अश्आर बेहतर ज़रिया माने जाते हैं। इस ज़बान में हर इंसान के लिए अपने जज़्बात का असरदार तरीक़े से इज़हार करने के लिए हर मौजूं पर शायरी मौजूद है। इश्क़ की शेरो-शायरी से शूरू हुआ उर्दू का ये सफ़र अब इंसानी ज़िंदगी के कई आयामों तक पहुंच गया है। अब न सिर्फ़ इश्क़ की नई तरह की शायरी हो रही है बल्कि रोज़मर्रा के सामाजिक और आर्थिक मसलों पर भी शायरी लिखी जा रही है। अगर कहा जाए कि उर्दू शायरी का ख़्वाबों ख़्यालों से शुरू हुआ सफ़र अब हक़ीकत की मंज़िल पर पहुंच गया है तो ग़लत न होगा। हम यहां ऐसे चंद शेरों पर ग़ौर करेंगे, जिनमें इश्क़ और हक़ीक़त दोनों एक साथ मौजूद हैं।

अहमद फ़राज़ का ये शेर हक़ीक़त को कुछ यूं बयां करता है -

'दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है
और तुझ से बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता'


अहमद फ़राज़ इस शेर में मोहब्बत पर यक़ीन का तो इज़हार करते हैं, लेकिन साथ ही उनके मन में जुदाई का भी एहसास कहीं न कहीं है। इसलिए उनके इस शेर में ज़िंदगी भर साथ रहने का यक़ीन नज़र नहीं आता।


'हर बात में महकी हुई जज़्बात की ख़ुशबू
याद आई बहुत पहली मुलाक़ात की ख़ुशबू'


बशीर बद्र का ये शेर बीते हुए हसीन लम्हों की याद दिलाता है। ज़िंदगी हर रोज़ कुछ क़दम आगे तो बढ़ती है लेकिन बीते हुए लम्हों को भुलाना भी आसान नहीं होता। ख़ासकर पहली मोहब्बत और महबूब से पहली मुलाक़ात। उसी दर्द को बशीर बद्र ने इस शेर में क़लमबंद किया है।

'इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब' 
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने' 


ज़िंदगी के कई मौजूं पर ग़ालिब के कई शेर हैं। लेकिन जितनी हक़ीक़त इस शेर में है वो शायह दूसरे शेरों में नहीं। ग़ालिब यहां क़बूल करते हैं कि इश्क़ आग की तरह है जिस पर किसी का ज़ोर नहीं है। साथ वो इस ओर भी इशारा करते हैं कि इश्क़ होने से पहले काफ़ी जद्दोजहद करनी पड़ती है और इश्क़ होने बाद इंसान इससे ख़ुद को अलग नहीं कर पाता।

'मुद्दतें गुज़री तेरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं'


अक्सर शायर तमाम उम्र महबूब की यादों में खोने की बातें करते हैं, मगर फ़िराक़ गोरखपुरी सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ते। बल्कि वो तो इस शेर में यहां तक कहते हैं कि महबूब की याद हुए मुद्दत गुज़र गई है। हमेशा तो उसकी याद नहीं आती लेकिन उसे भूल गए हों ऐसा भी नहीं है। फ़िराक़ को यह क़तई मंज़ूर नहीं है कि वो हर वक़्त खोए यादों में खोए रहें।

'और तो कोई बस न चलेगा, हिज्र के दर्द के मारों का
सुब्ह का होना दूभर कर दें, रस्ता रोक सितारों का'


जुदाई इश्क़ और इंसानी ज़िंदगी की एक कभी न मिटने वाली एक सच्चाई है। इब्ने-इंशा इस हक़ीक़त का इस शेर में इक़रार तो करते हैं, पर साथ ही वो दिली की झुंझलाहट को भी नहीं छुपता हैं। वो कहते हैं जुदाई की वजह से जो दर्द है उस पर तो कोई बस नहीं है, लेकिन सितारों का रास्ता रोक कर सुबह में अड़ंगा लगाया ही जा सकता है।

'कुछ कह रही हैं आपके सीने की धड़कनें
मेरा नहीं तो दिल का कहा मान जाइए'


क़तील शिफ़ाई के इस शेर से मालूम होता है कि वो महबूब से घुमा फिराकर बात करने में बिल्कुल दिलचस्पी नहीं रखते। वो महबूब से कहते हैं अपनी दिल की आवाज़ सुनो और ख़ुद ही मेरी मोहब्बत को महसूस करो। 

'जीने में क्या राहत थी, मरने में तकलीफ़ है क्या
जब दुनिया क्यों हंसती थी, अब दुनिया क्यों रोती है'


साग़र निज़ामी ने इस शेर में समाज की तल्ख़ हक़ीक़त को पिरो दिया है। वो ये मानते हैं ज़िंदगी में राहत है कहां दुश्वारियों ही दुश्वारियां हैं। इसके अलावा वो मौत से भी नहीं डरते और उन्हें उससे कोई तकलीफ़ नहीं है। वो ये भी कहते हैं कि मौत पर दुनिया वाले आंसू बहाते हैं, लेकिन जब वहीं शख़्स जिंदी होता है, तो बजाए उसके साथ खड़े होने के वही दुनिया वाले उस पर हंसते हैं।

'तुम ही न सुके अगर, क़िस्सा-ए-ग़म सुनेगा कौन
किस की ज़बां खुलेगी फिर, हम न अगर सुना सके'


हफ़ीज़ जालंधरी इस शेर में साफ़गोई से महबूब से कह रहे हैं कि जब तुम ही मेरे ग़म के हालात नहीं सुन रहे हो, तो दूसरा और कौन सुनेगा। अगर हम इस ग़म और दर्द को बयान नहीं कर सके, तो कई और दूसरा भी नहीं कर पाएगा। 

'सुंदर कोमल सपनों की बारात गुज़र गई जानां
धूप आंखों तक आ पहुंची है रात गुज़र गई जानां'


परवीन शाकिर इस शेर में ख़ुशगवार वक़्त के गुज़र जाने का दर्द बयां कर रही हैं। वो कहती हैं हसीन सपने अब बीते वक़्त की बात हैं। सच्चाई से मुंह मोड़ के कोई फ़ायदा नहीं।

'हज़ारों शोख़ अरमां ले रहे हैं चुटकियां दिल में
हया उनकी इजाज़त दे तो कुछ बेबाकियां कर लूं'


इश्क़ में चंचल अरमान उमड़ते रहते हैं। अख़्तर शीरानी इन्हीं अरमानों को लेकर कहते हैं कि दिल मचलता रहता और चंचल अरमान चुटकिया लेते रहते हैं। अगर महबूब की हया की इजाज़त मिल जाए तो कुछ बेबाक उनसे होया जाए।
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