आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Kavya Charcha ›   remembering revolutionary poet habib jalib shayari
remembering revolutionary poet habib jalib shayari

काव्य चर्चा

हबीब जालिब : तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था

राजेश कुमार यादव, आजमगढ़

905 Views
हुक्मरान चाहे जिस देश और रंग के रहे हों,  हुक्मरानों के बरक्स प्रतिरोध की आवाज़ का दूसरा नाम है हबीब जालिब। हबीब जालिब के शब्दकोश से शक और वहम तब गायब हो जाता है जब वे सियासतदारों से बात करते हैं। गहरे आत्मविश्वास के रथ पर सवार बेख़ौफ़ गूंजती हुई आवाज़। इस रथ में ईमान के पहिये हैं, सत्य की पताका है, आन्दोलनों के घोड़े हैं, विचारधारा का चाबुक है, अभय सारथी है और गद्दीनशीनों की हक़ीक़त समझने की कूबत का वेग - 

तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था 
उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था 


हबीब जालिब की बेटी के एक इंटरव्यू से शब्द उधार लें तो, "अब्बा तकरीबन 30 साल जेल में रहे। आधी उमर जेल में और आधी अस्पताल में।" हेमिंग्वे के कालजयी उपन्यास ‘ओल्ड मैन एंड द सी’ की इस बात को जालिब ने मज़बूती से दर्ज किया कि आदमी को मारा जा सकता है, पर उसे हराया नहीं जा सकता - 

दीप जिसका महल्लात ही में जले
चंद लोगों की खुशियों को लेकर चले
वो जो साये में हर मसलहत के पले
ऐसे दस्तूर को सुब्हे बेनूर को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता
ज़ुल्म की बात को, जेहल की रात को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता 


यह नज़्म जम्हूरियत का अकीदा है। जन विरोधी क़ानूनों  के ख़िलाफ़ यह नज़्म आज भी उतनी ही मौजूं है। जालिब लोकतंत्र  के सवाल को बहुत ही ज़मीनी सच्चाइयों से जोड़ देते हैं और तीसरी दुनिया की अवाम की आवाज़ से आवाज़ मिलाते हुए हुक्मरानों और अवाम की दो दुनिया में से अपना पक्ष चुनते हैं - 

अगर मैं फिरंगी का दरबान होता 
तो जीना किस कदर आसान होता
मेरे बच्चे भी अमरीका में पढ़ते
हर गर्मीं में इंगलिश्तान होता 


हबीब जालिब 28 फरवरी 1928 को भारत के जिला होशियारपुर में पैदा हुए। हबीब जालिब जब मैट्रिक में थे तभी देश तक्सीम हुआ। इनके वालिद सूफी इनायतुल्लाह खुद पंजाबी के शायर थे। तक्सीम में जालिब वालिदैन के साथ पाकिस्तान आये। एक किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले इस शायर ने गरीबी की कोख से जन्म लेने के बावजूद अपने आत्म सम्मान और स्वाभिमान को किसी हाकिम समय के हाथ बिकने नहीं दिया। यह हबीब जालिब ही की बोल्ड तबियत थी जिसने उनसे जनरल ज़ियाउल हक़ के दौर में ऐसे मिसरे कहलवाये। जालिब की आवाज़ में एक ख़ास जादू है। गहरी बेचैनी से भरी मीठी आवाज़ में उनकी शायरी अपने हर सुनने वाले से सीधे संवाद करती है, उनके दिल में उतरती चली जाती है। इसलिए भी जालिब जैसे शायरों पर लिखना बेहद मुश्किल काम है क्योंकि उनकी शायरी और अवाम के बीच फासला लगभग न के बराबर है। शुरुआत से ही कविता मूलतः सुनने की विधा रही है। सीधे अपनी अवाम से बात करने के लिए, उससे मुख़ातिब शायर को इस फ़न की ज़रूरत है। जालिब ने कविता के इस मूल गुण को पकड़ा और अवाम से सीधे संबोधित हुए - 

हरियाली को आंखे तरसें बगिया लहू लुहान
प्यार के गीत सुनाऊँ किसको शहर हुए वीरान
बगिया लहू लुहान
डसती हैं सूरज की किरनें चांद जलाए जान
पग-पग मौन के गहरे साये जीवन मौत समान
चारों ओर हवा फिरती है लेकर तीर कमान
बगिया लहू लुहान 
आगे पढ़ें

सुना है जिम्मी कार्टर आपका है पीर मौलाना

Comments
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!