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Remembering Famous Hindi Poet Ramdhari Singh Dinkar on birthday 23 september

काव्य चर्चा

दिनकर की रचनाएं हमारे जातीय साहित्य की अमूल्य धरोहर

डॉ. सेवाराम त्रिपाठी, रीवा

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मैं सोचता हूँ कि दिनकर की कविता में ऐसा क्या है जो हमें बार-बार आकर्षित करता है। वह है उनका खरापन, उनकी साफ़गोई और दिल खोल अंदाज़। उनकी कविता में गूँज और अनुगूँज बहुत है। दिनकर की कविताओं की सादगी बहुत प्रभावित करती है और कहन का तो कहना ही क्या? उनकी कविताओं में जनजागरण की विशेष खूबी है। ये कवितायें अनपढ़ों, किसानों, मज़दूरों और छोटे-छोटे लोगों को भी पसंद आती है। उनका एक प्रिय कविता का नारा सभी को बहुत पसंद आता है और आकर्षित भी करता है। वह है- सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। इसमें कोई राजनैतिक पैटर्न नहीं है। एक सादगी है कि जो सरकार जनता के विश्वासों पर खरी नहीं उतरेगी। उसे सिंहासन खाली करना पड़ेगा। दिनकर जी से आप सहमत-असहमत हो सकते हैं लेकिन उनकी राष्ट्रीयता, उनका जनता के प्रति प्रेम और अगाध विश्वास दोनों लाजबाव हैं। मुझे उनकी एक कविता बार-बार याद आती है वह हमारे समय के द्वन्द्वों को निरन्तर आलोकित भी करती है। दिनकर हमें बार-बार आगाह करने वाले और निरन्तर टेरने वाले रचनाकार हैं। उनकी कविता की पदचापें हमें हमेशा जागृत करती हैं। वह कविता है ‘आग की भीख’-
 
बेचैन है हवायें, सब ओर बेकली है
कोई नहीं बताता किश्ती किधर चली है।
मजधार है, भंवर है या पास किनारा?
यह नाश आ रहा है या सौभाग्य का सितारा?

 
मेरी दृष्टि में काव्यालोचन का क्षेत्र वीर पूजा का क्षेत्र नहीं होता। किसी भी रचनाकार का परीक्षण उसकी कृतियों, उसके समय की तमाम चुनौतियों, उसकी मान्यताओं और प्रतिक्रियाओं तथा विभिन्न विभीषिकाओं और विसंगतियों के आधार पर होता है। हिन्दी साहित्यालोचन की एक विकट समस्या यह भी रही है कि उसमें या तो स्नेह, पूजा, श्रद्धा का घनत्व रहा है या घृणा और तिरस्कार का। श्रद्धा, पूजा अथवा घृणा के अतिरेक में न जाने कैसे-कैसे जुमलें प्रचलित हो जाते हैं और उन जुमलों को झांझ मंजीरे की तान के साथ गाया बजाया भी जाता है। यह कीर्तनियां परम्परा कमोवेश अभी भी जारी है। आश्चर्य है कि असली मुद्दे लगभग गायब हो जाते हैं या उन्हें अनदेखा कर दिया जाता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कहा और रीतिकाल के अलग तरह के आचार्य कवि केशव ‘कठिन काव्य के प्रेत’ हो गये या ‘हृदयहीन’ हो गये। तुलसीदास कुछ की नज़र में ‘लोकवादी’ हो गये तो किसी ने उन्हें ‘लोकनायक’ की संज्ञा दी और किसी ने उन्हें ‘समाज का पथभ्रष्टक’ तक कह डाला। इस दौर की आलोचना के मुद्दे या सूत्र या तो डॉ. रामविलास शर्मा के निरीक्षण परीक्षण से चलते रहे हैं या डॉ. नामवर सिंह की मान्यताओं के परिप्रेक्ष्य में अथवा कुछ बीच की धारा के आलोचकों की कथन भांगिमाओं में। कुछ भाषा भंगिमाओं के लहजे में। एक महत्वपूर्ण समस्या यह भी है कि या तो मुँह देखी हो रही है या लीपापोती अथवा उठाने और गिराने के खेल। मैं सोचता हूं कि इस तथ्य के सूत्र हमारी समकालीन आलोचना में खोजे जा सकते हैं। दिनकर जी के बारे में कुछ इसी तरह के सूत्र हिन्दी आलोचना में बिखर गये हैं मसलन ‘युगचारण दिनकर’ ‘जनकवि दिनकर’ युगकवि दिनकर या ‘दिग्भ्रमित राष्ट्रकवि दिनकर।’
 
दिनकर की कविता के दो मुख्य स्वर हैं। पहला क्रांति, विद्रोह और राष्ट्रीयता दूसरा प्रेम और श्रृंगार। उनके व्यक्तित्व में रोमैंटिक मिज़ाज की निर्णयकारी भूमिका है। क्रांति विद्रोह और राष्ट्रीयता में भी रोमैंटिक स्थितियां होती हैं। प्रेम और श्रृंगार में रोमैंटिक भाव सरणि होती ही है। यह भावभयता एक ऐसी धारा है जिसमें सब कुछ लुटाने की तमन्ना होती है। इसीलिये प्रेम करने वाला अपने प्रेम के लिये सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार होता है। उसी तरह क्रांतिकारी और विद्रोही भी अपना सब कुछ समर्पण के लिये तैयार होता है। क्रांतिकारियों के बलिदान एवं प्रेमियों के बलिदान इसके उदाहरण हैं। दिनकर की भावभयता में रोमैंटिक भावधारा की बहुत जबर्दस्त भूमिका हमेशा रही है। उनकी कविता के ताने-बाने में इसे सहज ही देखा जा सकता है।  आगे पढ़ें

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