आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Kavya Charcha ›   Prominent veteran Urdu poet Gulzar Dehalvi devoted his entire life to the service of Urdu
Prominent veteran Urdu poet Gulzar Dehalvi devoted his entire life to the service of Urdu

काव्य चर्चा

पद्मश्री गुलज़ार देहलवी : लाअो मैं रख लूं कलेजे में तुम्हारे तीर को 

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

927 Views
ख़ुदा ने हुस्न दिया है तुम्हें शबाब के साथ 
शुबु-अो-ज़ाम खनकते हुए रबाब के साथ 

निगाह-अो-ज़ुल्फ़ अगर कुफ्र है तो ईमां रुख़
शराब उनको अता की किताब के साथ 

अब कहां तुम दस्त-ए-नाज़ुक से उठाअोगे कमां
लाअो मैं रख लूं कलेजे में तुम्हारे तीर को 

वो कहते हैं ये मेरा तीर है ज़ां ले के निकलेगा 
मैं कहता हूं ये मेरी जान है मुश्किल से निकलेगी।


गुलज़ार देहलवी यानि पंडित आनंद मोहन जुत्शी की शायरी में हमेशा गंगा-जमुनी तहजीब की झलक मिलती है। इन्हें राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत शायर के रूप में भी जाना जाता है। उनकी ज़बान उर्दू है और उसी भाषा में गुलज़ार साहब की लेखनी ने लोगों के दिलों को छुआ।  

उम्र जो बे-ख़ुदी में गुज़री है 
बस वही आगही में गुज़री है 

कोई मौज-ए-नसीम से पूछे 
कैसी आवारगी में गुज़री है 

उन की भी रह सकी न दाराई 
जिन की अस्कंदरी में गुज़री है 

आसरा उन की रहबरी ठहरी 
जिन की ख़ुद रहज़नी में गुज़री है 

यूँ तो शायर बहुत से गुज़रे हैं 
अपनी भी शायरी में गुज़री है 

मीर के बाद ग़ालिब ओ इक़बाल 
इक सदा, इक सदी में गुज़री है 


गुलज़ार साहब का सम्बन्ध कश्मीर से है लेकिन वे दिल्ली में ही रहे। मौजूदा समय में नोयडा में उनका आवास है। उर्दू की दुनिया में देहलवी जी का महत्वपूर्ण हस्तक्षेप रहा है, शायरी को उन्होंने अलग ऊंचाई दी।  

उस सितमगर की मेहरबानी से 
दिल उलझता है ज़िंदगानी से 

ख़ाक से कितनी सूरतें उभरीं 
धुल गए नक़्श कितने पानी से 

हमसे पूछो तो ज़ुल्म बेहतर है 
इन हसीनों की मेहरबानी से 

और भी क्या क़यामत आएगी 
पूछना है तेरी जवानी से 

दिल सुलगता है अश्क बहते हैं 
आग बुझती नहीं है पानी से 


7 जुलाई 1926 जन्मे गुलज़ार साहब ने बचपन में ही शायरी की शुरुआत कर दी थी। तब वे अपने वालिद के साथ दिल्ली में ही रहते थे। घर में शायरना माहौल था इसलिए गुलज़ार साहब पर इसका असर पड़ना लाज़िमी था। असर ऐसा हुआ कि वे उर्दू शायरी की दुनिया के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर बन गए। आजादी की आंदोलन में कई जलसों में अपनी शायरी से जोश भरने का काम किया। उनकी शायरी के मुरीद जवाहरलाल नेहरू भी हुआ करते थे।

जरूरत है उन नौजवानों की हमको..

जो आगोश में बिजलियों के पले हों, 
कयामत के सांचे में अकसर ढले हों,

जो आतिश फिजा की तरह भड़के,
जो ले सांस भी तो बरपा जलजले हों

उठाए नजर तो बरस जाए बिजली, 
हिलाएं कदम तो बरपा जलजले हों

जरूरत है उन नौजवानों की हमको


गुलज़ार साहब ने दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. और एल.एल.बी. की पढ़ाई पूरी की। उर्दू शायरी और साहित्य में उनके योगदानों को देखते हुए उन्हें 'पद्मश्री' पुरस्कार से नवाजा गया। 2009 में उन्हें 'मीर तकी मीर' पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। 

फ़लाह-ए-आदमियत में सऊबत सह के मर जाना 
यही है काम कर जाना यही है नाम कर जाना 

जहाँ इंसानियत वहशत के हाथों ज़ब्ह होती हो 
जहाँ तज़लील है जीना वहाँ बेहतर है मर जाना 

यूँ ही दैर ओ हरम की ठोकरें खाते फिरे बरसों 
तिरी ठोकर से लिक्खा था मुक़द्दर का सँवर जाना 

सुकून-ए-रूह मिलता है ज़माने को तिरे दर से 
बहिश्त-ओ-ख़ुल्द के मानिंद हम ने तेरा दर जाना 

हमारी सादा-लौही थी ख़ुदा-बख़्शे कि ख़ुश-फ़हमी 
कि हर इंसान की सूरत को मा-फ़ौक़-उल-बशर जाना    

 
Comments
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!