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poet hafeez jalandhari writer of national anthem of pakistan wrote krishna bhajan

काव्य चर्चा

हफ़ीज़ जालंधरी : ऐ देखने वालो, इस हुस्न को देखो

राजेश कुमार यादव, आजमगढ़

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भारत और पाकिस्तान की आजादी की 70वीं सालगिरह के मौके पर सोशल मीडिया पर एक वीडियो बड़ी तेजी से वायरल हुआ था, जिसमें दोनों देशों के कलाकार पाकिस्ताकन का कौमी तराना 'पाक सरज़मीं शाद बाद...' और भारत का राष्ट्रगान 'जन-गण-मन...' गा रहे थे। यह विडियो राम सुब्रमण्यन के ग्रुप 'वॉइस ऑफ राम' की सोच और मेहनत से संभव हो पाया। इस ग्रुप ने भारत और पाकिस्तान के गायकों से संपर्क साधा। इन सिंगर्स ने बारी-बारी से पाकिस्तान और भारत का राष्ट्रगान गाया। इस वीडियो को यहां देखें - 


 


दोनों मुल्कों के रिश्तों में तल्ख़ी के बीच रिश्तों में गर्माहट पैदा करने की इस कोशिश की बहुत प्रशंसा हुई। 'पाक सरज़मीं' पाकिस्तागन का राष्ट्रगान है, जिसे प्रख्यात शायर हफ़ीज़ जालंधरी ने लिखा है। अगस्त 1954 में पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर इस गीत को अपना राष्ट्रगान घोषित कर दिया था। लेकिन हफ़ीज़ की चर्चा पाकिस्तान का कौमी तराना लिखने वाले शायर से अधिक ‘कृष्ण गीत' लिखने वाले शायर के रूप में अधिक होती है - 

ऐ देखने वालो 
इस हुस्न को देखो 
इस राज़ को समझो 
ये नक़्श-ए-ख़याली 
ये फ़िक्रत-ए-आली 
ये पैकर-ए-तनवीर 
ये कृष्ण की तस्वीर 
मअनी है कि सूरत 
सनअत है कि फ़ितरत 
ज़ाहिर है कि मस्तूर 
नज़दीक है या दूर 
ये नार है या नूर 
दुनिया से निराला 
ये बाँसुरी वाला 
गोकुल का ग्वाला 


अबू अल-असर हफ़ीज़ जालंधरी का जन्म 14 जनवरी 1900 में पंजाब के जालंधर में हुआ था। 1947 में भारत के विभाजन के बाद वह लाहौर, पाकिस्तान में जाकर रहने लगे। पाकिस्ताान का कौमी तराना लिखने वाले इस शायर की जड़ें भारत की माटी और संस्कृति से बहुत गहरे जुड़ी हैं। हफ़ीज़ ने लिखा है, "मेरा खानदान तक़रीबन 200 बरस पहले चौहान राजपूत कहलाता था। मेरे बुज़ुर्ग हिन्दू से मुसलमान हो गये और बदले में अपनी जायदाद वग़ैह खो बैठे। हां, सूरजबंसी होने का ग़ुरूर मुसलमान होने के बावजूद साथ रहा, मेरी ज़ात तक पहुंचा और ख़त्म हो गया।" 

इक बार फिर वतन में गया जा के आ गया 
लख़्त-ए-जिगर को ख़ाक में दफ़ना के आ गया 
हर हम-सफ़र पे ख़िज़्र का धोका हुआ मुझे 
आब-ए-बक़ा की राह से कतरा के आ गया
अभी तो मैं जवान हूं 


"अभी तो मैं जवान हूं" हफ़ीज़ जालंधरी की ये नज़्म मलिका पुखराज की जादुई आवाज़ में आपने ज़रूर सुनी होगी। इस नज़्म को नूरजहाँ ने भी अपनी ख़ूबसूरत आवाज़ दी है। आज़ादी से पहले के दौर में हफ़ीज़ जालंधरी शायद सबसे अधिक लोकप्रिय शायर थे, जिनकी नज़्में और ग़ज़लें साहित्य-प्रेमियों की ज़ुबान पर चढ़ी हुई थी - 

हवा भी ख़ुश-गवार है
गुलों पे भी निखार है
तरन्नुम-ए-हज़ार है
बहार पुर-बहार है
कहाँ चला है साक़िया
इधर तो लौट इधर तो आ
पिलाए जा पिलाए जा
अभी तो मैं जवान हूं 
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'लब ऊपर-ऊपर हँसतें है, दिल अंदर-अंदर रोता है'

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