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parveen shakir famous urdu poet of pakistan shayari and ghazal

मैं इनका मुरीद

परवीन शाकिर : तेरी चाहत के भीगे जंगलों में, मेरा तन मोर बन कर नाचता है

राजेश कुमार यादव, आजमगढ़

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आज तो उस पे ठहरती ही न थी आंख ज़रा 
उसके जाते ही नज़र मैंने उतारी उसकी 

तेरे सिवा भी कई रंग ख़ुशनज़र थे मगर 
जो तुझको देख चुका हो वो और क्या देखे 

मेरे बदन को नमी खा गई अश्कों की 
भरी बहार में जैसे मकान ढहता है 

सर छुपाएँ तो बदन खुलता है 
ज़ीस्त मुफ़लिस की रिदा हो जैसे 

तोहमत लगा के माँ पे जो दुश्मन से दाद ले 
ऐसे सुख़नफ़रोश को मर जाना चाहिये 


परवीन शाकिर ने बहुत कम अरसे में शायरी में वो मुक़ाम हासिल किया, जो बहुत कम लोगों को ही मिल पाता है। परवीन की शायरी, खुशबू के सफ़र की शायरी है। प्रेम की उत्कट चाह में भटकती हुई, वह तमाम नाकामियों से गुज़रती हैं, फिर भी जीवन के प्रति उसकी आस्था ख़त्म नहीं होती। जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखते हुए, वह अपने धैर्य का परीक्षण भी करती हैं।

कमाल-ए-ज़ब्त को खुद भी तो आज़माऊँगी 
मैं अपने हाथ से उसकी दुल्हन सजाऊँगी 


परवीन शाकिर का जन्म पाकिस्तान के कराची में 24 नवंबर 1952 को हुआ। नारी-मन की व्यथा को अपनी मर्मस्पर्शी शैली के ज़रिये अभिव्यक्त करने वाली पाकिस्तानी शायरा परवीन शाकिर उर्दू-काव्य की अमूल्य निधि हैं। सरस्वती की इस बेटी को भारतीय काव्य-प्रेमियों ने सर-आँखों पर बिठाया। उनकी शायरी में भारतीय परिवेश और संस्कृति की खुशबू को महसूस किया - 

ये हवा कैसे उड़ा ले गयी आँचल मेरा 
यूँ सताने की तो आदत मेरे घनश्याम की थी 


प्रेम और सौंदर्य के विभिन्न पक्षों से सुगन्धित परवीन शाकिर की शायरी हमारे दौर की इमारत में बने हुए बेबसी और विसंगतियों के दरीचों में भी अक्सर प्रवेश कर जाती है -

ये दुख नहीं कि अँधेरों से सुलह की हमने 
मलाल ये है कि अब सुबह की तलब भी नहीं 


आपने किसी शायरा के बारे में सुना है कि उसने कोई लिखित परीक्षा दी हो और उस परीक्षा में उन्हीं पर एक सवाल पूछा गया हो। ऐसा पाकिस्तान की मशहूर शायरा परवीन शाकिर के साथ हुआ था जब उन्होंने 1982 में सेंट्रल सुपीरियर सर्विस की परीक्षा दी थी। नौ सालों तक अध्यापन करने के बाद परवीन सिविल सेवा में चुनी गई थीं और उन्हें कस्टम विभाग में तैनात किया गया था। परवीन शाकिर अव्वल दर्जे की शिक्षित महिला थीं क्योंकि उनके पास एक नहीं तीन-तीन "स्नातकोत्तर" की डिग्रियाँ थीं। परवीन शाकिर उर्दू शायरी में एक युग का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनकी पहली किताब "खुशबू" ने उन्हें "अदमजी" पुरस्कार दिलवाया। आगे जाकर उन्हें पाकिस्तान के सर्वोच्च पुरस्कार "प्राईड ऑफ परफ़ोरमेंस" से भी नवाज़ा गया। पहले-पहल परवीन "बीना" के छद्म नाम से लिखा करती थीं। वे "अहमद नदीम क़ासमी" को अपना उस्ताद मानती थीं और उन्हें "अम्मुजान" कहकर पुकारती थीं। परवीन की शायरी अपने-आप में एक मिसाल है।  आगे पढ़ें

कमाल की ग़ज़ल तुम को सुनायेंगे किसी रोज़ 

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