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Famous Urdu poet Josh Malihabadi popularly known as Shayar-e-Inquilab best shayari
काव्य चर्चा

जोश मलीहाबादी : जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया

  • रत्नेश मिश्र, काव्य डेस्क, नई दिल्ली
  • शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017
दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया,
जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया।
 
इसका रोना नहीं क्यों तुमने किया दिल बरबाद,
इसका ग़म है कि बहुत देर में बरबाद किया।
 
मुझको तो होश नहीं तुमको ख़बर हो शायद
लोग कहते हैं कि तुमने मुझे बरबाद किया।

 
गुलाम अली की खनकती आवाज में ये ग़ज़ल आप जितनी बार सुनेंगे, कानों के तार-तार बजने लगेंगे, और अगर शेरो-शायरी का शौक रखते हैं तो 'जोश' साहब जरूर याद आएंगे।जी हाँ, जोश मलीहाबादी साहब ! वही जोश मलीहाबादी जिन्होंने अपनी क्रांतिकारी नज़्मों से अंग्रेज सरकार की खटिया खड़ी कर दी थी। अक्सर होता ये है कि जब आप कोई गीत सुन रहे होते हैं तो उसकी धुनों में खोए रहते हैं। लेकिन जिन शब्दों को आप सुन रहे होते हैं, गुनगुना रहे होते हैं, उन शब्दों के कलमकार की तरफ जब ध्यान जाता है तब आपको उस  रचनाकार के तेवर का पता चलता है। जोश मलीहाबादी साहब ऐसे ही शायर हैं। तेवर वाले शायर ! मीर और ग़ालिब के बाद अगर किसी ने उर्दू कविता को नई ऊंचाई दी, उसे समृद्ध किया तो निस्संदेह एक नाम 'शब्बीर हसन खां' यानि जोश मलीहाबादी का भी होगा। जोश साहब को अपनी ग़ज़लों, नज़्मों  और मर्सियों की मार्फ़त बहुत शोहरत मिली। जोश मलीहाबादी विद्रोही प्रकृति के शायर थे, अपनी नज़्मों-ग़ज़लों  में उन तमाम दकियानूसी परंपराओं को तोड़ते हैं जो उन्हें ग़ैर तार्किक लगता है। वे अंग्रेज़ों के लिए वे अपनी कलम के बदौलत 'बागी' थे लेकिन असल में आजादी की लड़ाई वे अपनी कलम से ही लड़ रहे थे। यही कारण था कि “जोश” को अंग्रेजों के जमाने में “शायर-ए- इन्कलाब” की उपाधि दी गयी थी। उस ज़माने में जोश साहब ने जॉर्ज की ताजपोशी के बाद देश की बदहाली पर तंज करती नज़्में लिखीं, जिसमें "वफ़ादाराने अजली का पयाम, शहंशाहे हिन्दुस्तान के नाम" बहुत चर्चित रही-
 
आपके हिन्दोस्तां के जिस्म पर बोटी नहीं
तन पे इक धज्जी नहीं, पेट में रोटी नहीं
किश्वरे-हिन्दोस्तां में रात को हंगामे-ख़्वाब
करवटें रह रह के लेता है फ़ंज़ा में इंक़िलाब

 
'जोश' सच्चे अर्थों में इंक़लाबी शायर थे, लेकिन स्वभाव से वे बहुत संवेदनशील थे और उनका इंक़लाबी देश प्रेम से उपजा हुआ इंक़लाब है, अपनी नज़्म ”ईस्ट इंडिया कंपनी के फ़रजंदों के नाम” में उन्होंने लिखा-
 
जुल्म भूले, रागिनी इंसाफ़ की गाने लगे
लग गई है आग क्या घर में कि चिल्लाने लगे
इक कहानी वक़्त लिखेगा नये मज़मून की
जिसकी सुखी को ज़रूरत है तुम्हारे ख़ून की।

 
कहा जाता है कि इस तरह की उनकी कई नज्में अंग्रेज़ सरकार द्वारा ज़ब्त कर ली गयीं थीं। 5 दिसंबर 1998 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ के मलीहाबाद में "जोश" साहब का जन्म हुआ। इनका वास्तविक नाम शब्बीर हसन खान था। "जोश" मलीहाबादी उर्दू, अरबी और फ़ारसी के जानकार थे, उर्दू से तो उन्हें बहुत लगाव था। कहते हैं कि अगर कोई ग़लत बोलता या लिखता तो वे भड़क जाते थे। 1958 तक वे भारत के नागरिक रहे लेकिन उसके बाद पाकिस्तान चले गए। मलीहाबाद उनके रोम-रोम में बसा था। उनके ये जज़्बात उनकी नज़्म "ऐ मलीहाबाद के रंगीं गुलिस्तां" में निकलते हैं-
 
कल से कौन इस बाग़ को रंगीं बनाने आएगा
कौन फूलों की हंसी पर मुस्कुराने आएगा
कौन इस सब्ज़े को सोते से जगाने आएगा
कौन जागेगा क़मर के नाज़ उठाने के लिये
चांदनी रातों को ज़ानू पर सुलाने के लिये
ऐ मलीहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा      
 
 
आ गले मिल लें खुदा हाफ़िज़ गुलिस्तान-ए-वतन
ऐ अमानीगंज के मैदान ऐ जान-ए-वतन
 
 
हश्र तक रहने न देना तुम दकन की खाक में
दफ़न करना अपने शाएर को वतन की खाक में
ऐ मलीहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा !
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