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Famous urdu poet Jaun Elia Best shayari

काव्य चर्चा

पुण्यतिथि विशेष, जॉन एलिया : उर्दू का एक शायर, ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं

रत्नेश मिश्र, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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मैं भी बहुत अजीब हूं, इतना अजीब हूं कि बस
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं।


जॉन की शायरी में उनकी छलकती हुई संवेदनाएं हैं, वो जो भी हैं, जैसे भी हैं अपने जैसे हैं। 14 दिसंबर 1931 को उत्तर प्रदेश के अमरोहा में एक संभ्रांत परिवार में जॉन ने जन्म लिया। जॉन बड़े सुसंस्कृत और पढ़े-लिखे व्यक्ति थे। उनके बारे में कहा जाता है कि 8 साल की उम्र में उन्होंने पहली शायरी कही। जॉन साहब के पिता का नाम अल्लामा शफीक हसन एलिया था, जो जाने-माने विद्वान और शायर। उनके बड़े भाई रईस अमरोही भी जाने-माने पत्रकार और शायर थे। आप यह समझ सकते हैं कि शायरी तो जॉन के खून में थी। जॉन बचपन से बहुत संवेदनशील थे, बंटवारे के बाद उन्हें पाकिस्तान जाना पड़ा। हालाँकि जॉन अपनी जन्मभूमि को छोड़ना नहीं चाहते थे। लेकिन बंटवारे के बाद वे अपनी चाहतों के साथ नहीं रह सके, उन्हें जाना ही पड़ा। वे क्षुब्ध थे, यह कौमी विभाजन उनके ह्रदय में शूल की तरह चुभता रहा। जॉन वैचारिक रूप से साम्यवादी थे और हर हाल में भारत में ही रहना चाहते थे। उनके अधिकतर रिश्तेदार पाकिस्तान चले गए थे, अाख़िरकार जॉन ने भी 1956 में अपनी सरज़मीं को बहुत दुखी मन अलविदा कह दिया और करांची में बस गए। लेकिन जीवनभर उन्हें यह बात खलती रही। आख़िरी सांस तक भारत को याद करते रहे। 

जॉन उर्दूदां शायरों की दुनिया में एक ऐसे फूल की तरह हैं जिसने अपनी महक धीरे-धीरे बिखेरी और जब उनके शायरी की ख़ुशबू फैली तो लोग उनके दीवाने होते चले गए। वे अपने ढंग के अनूठे और स्वाभिमान के प्रति सजग रहने वाले शायर थे। और ये ठसक उनकी शायरी में भी दिखती है - 

मैं जो हूँ जॉन एलिया हूँ जनाब 
मेरा बेहद लिहाज कीजिएगा। 


खुद को इस ढंग से पेश करने का उनका अपना अंदाज़, फक्कड़ी मिज़ाज और बिंदास जीवनशैली के इस शायर को पढ़ते हुए कई बार यह समझना मुश्किल हो जाता है कि आख़िर ये किस तरह के जीवन मूल्यों की तलाश में थे। उनकी शायरी में ठसक है, तंज है, बेबाकी है लेकिन एक अनजाने आदर्शों की खोज भी है। वे लिखते हैं - 

लीक लीक तीनों चलें, कायर, कूत-कपूत 
बिना लीक तीनों चलें, सायर, सिंह सपूत। 
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