आपका शहर Close
Home ›   Kavya ›   Kavya Charcha ›   famous hindi poet padma bhushan kunwar narayan birthday 19 september
famous hindi poet padma bhushan kunwar narayan birthday 19 september

काव्य चर्चा

स्मृति शेष पद्म भूषण कुँवर नारायण : शायद उसी मुश्किल वक्त में...  

रत्नेश मिश्र, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

1528 Views
इतिहास और मिथकों के अध्ययन-चिंतन के जरिए भविष्य और वर्तमान की कल्पना करना और उसे अपनी रचनात्मकता में ढाल देना, नई कविता आंदोलन के सशक्त पैरोकार प्रख्यात हिंदी कवि कुंवर नारायण की विशेषता है। मशहूर हिंदी कवि कुंवर नारायण का जन्म 19  सितम्बर 1927  को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद ज़िले में हुआ। 12 वीं तक विज्ञान विषय में पढ़ाई करने के बाद लखनऊ विश्वविद्यालय से 1951 में अंग्रेजी  साहित्य में एम.ए. किया। एम.ए. करने के बाद उन्होंने लिखना शुरू कर दिया।

29 वर्ष की उम्र में जब कुंवर नारायण की पहली कविता संग्रह 'चक्रव्यूह' प्रकाशित हुई तब अज्ञेय ने उनकी कविताओं को केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और विजयदेव नारायण शाही के साथ "तीसरा सप्तक" में  शामिल किया। ज़ाहिर है कि उनकी कविताएं समकालीन रचनाकारों को प्रभावित कर रहीं थीं। कुंवर नारायण जल्द ही साहित्य में अपनी पहचान बनाने में सफल रहे। उनका रचना संसार व्यापक है। वे न सिर्फ कविताओं तक सीमित रहे बल्कि गद्य लेखन में भी उन्होंने विशेष योगदान दिया। हालांकि उनकी मूल विधा कविता ही रही लेकिन उसके अलावा लेख, कहानी, रंगमंच और सिनेमा के क्षेत्र में उन्होंने अपनी कलम चलाई। कुंवर नारायण हमारे समय के श्रेष्ठ साहित्यकारों में से एक थे। उन्होंने अपनी पूरी काव्ययात्रा में मानवीय संबंधों को नए तरह से परिभाषित किया। नवसामाजिक मूल्यों के प्रति उनकी निष्ठा साफ़ झलकती है, पुरानी और रूढ़ हो चुकी अवैज्ञानिक मान्यताओं के प्रति उनके मन में जो गुस्सा था, वह उनकी रचनाओं में नजर आता है। उनकी कविताओं में सत्ता के प्रति प्रतिरोध भी दिखता है। किसी भी तरह की हिंसा उन्हें बर्दाश्त नहीं। आइए देखते हैं उनके कुछ कविताओं के तेवर - 

"शायद उसी मुश्किल वक्त में 
जब मैं एक डरे हुए जानवर की तरह 
उसे अकेला छोड़ कर बच निकला था ख़तरे से सुरक्षा की ओर 
वह एक फ़ंसे हुए जानवर की तरह 
ख़ूंखार हो गया था।" 


जो हिंसक हो गया उसकी पहचान करना आसान है लेकिन कुंवरजी अपनी संपूर्ण रचनात्मकता में गहरी अहिंसा दृष्टि से भरे हुए थे और हिंसा के प्रति उतनी ही अस्वीकार्यता रही। भाषा के प्रति सजगता भी उनकी विशेषता रही और जनभाषा की वकालत करते रहे। ऐसी भाषा से बचने का प्रयास करते रहे जो आम लोगों की समझ के बाहर हो। इस बात को उनकी कविता "भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी" से बख़ूबी समझा जा सकता है - 

एक भाषा जब सूखती है 
शब्द खोने लगते अपना कवित्व
भावों की ताजगी
विचारों की सत्यता -
बढ़ने लगते लोगों के बीच
अपरिचय के उजाड़ और खाइयां... 

सोच में हूं कि सोच के प्रकरण में
किस तरह कुछ कहा जाय
कि सब का ध्यान उनकी ओर हो
जिनका ध्यान सब की ओर है -

कि भाषा की ध्वस्त पारिस्थितिकी में
आग यदि लगी तो पहले वहाँ लगेगी
जहाँ ठूँठ हो चुकी होंगी
अपनी जमीन से रस खींच सकनेवाली शक्तियाँ।
आगे पढ़ें

साहित्य के सबसे बड़े पुरस्कार से नवाज़ा गया

Comments
सर्वाधिक पढ़े गए
Top
Your Story has been saved!