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Eminent Urdu poet Shuja Khawar is an important signature of Urdu poetry

काव्य चर्चा

शुजा खावर : दिल की आग ऐसी कि हम को रोज़ सुलगानी पड़े 

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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ख़्वाबों से भी मिलते नहीं हालात के डर से 
माथे से बड़ी हो गईं यारों शिकनें क्या ।


उर्दू शायरी की दुनिया में शुजा खावर अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज करते हैं। उनका सूफियाना मिज़ाज उनकी शायरी में बखूबी दिखता है। 24  दिसंबर 1946 को दिल्ली में पैदा हुए शुजा साहब सूफ़मिजाज के शायर थे।

मिट्टी था, किसने चाक पे रख कर घुमा दिया
वह कौन हाथ था कि जो चाहा बना दिया। 


उनका असली नाम शुजाउद्दीन साज़िद था। पेशे से वे कुछ समय के लिए अध्यापक थे लेकिन ज्यादा दिन नहीं रह पाए, आई.पी.एस की परीक्षा पास की और पुलिस ऑफिसर बन गए, लेकिन उनके अंदर का शायर हमेशा उस प्रशासक से लड़ता रहता था। क्योंकि उनकी पहचान बतौर शायर ज्यादा थी।  

ख़्वाब इतने हैं यही बेचा करें
और क्या इस शहर में धंधा करें

क्या ज़रा सी बात का शिकवा करें
शुक्रिये से उसको शर्मिंदा करें

तू कि हमसे भी न बोले एक लफ़्ज़
और हम सबसे तेरा चर्चा करें

सबके चेहरे एक जैसे हैं तो क्या
आप मेरे ग़म का अंदाज़ा करें

ख़्वाब उधर है और हक़ीक़त है इधर
बीच में हम फँस गये हैं क्या करें

हर कोई बैठा है लफ़्ज़ों पर सवार
हम ही क्यों मफ़हूम का पीछा करें


अपने शायराना मिज़ाज को ज्यादा तवज्जो देते हुए शुजा साहब ने 1994 में रिटायरमेंट से पहले ही अवकाश ले लिया और शायरी की दुनिया में पूरी तरह से सक्रिय हो गए। जीवन की कड़वी सच्चाइयों को अपनी कलमकारी में शामिल करने वाला यह शायर अपने आप में अलहदा है। आज की नफ़ासत भरी जिंदगी और चकाचौंध से अलग एक कलमकार के स्वाभिमान की बातें वे ऐसे करते हैं-  

समझते क्या हैं इन दो चार रंगों को उधर वाले 
तरंग आई तो मंज़र ही बदल देंगे नज़र वाले 

इसी पर ख़ुश हैं कि इक दूसरे के साथ रहते हैं 
अभी तन्हाई का मतलब नहीं समझे हैं घर वाले
 
सितम के वार हैं तो क्या क़लम के धार भी तो हैं 
गुज़ारा ख़ूब कर लेते हैं इज़्ज़त से हुनर वाले
 
कोई सूरत निकलती ही नहीं है बात होने की 
वहाँ ज़ोअम-ए-ख़ुदा-वंदी यहाँ जज़्बे बशर वाले।


कुछ समय के लिए उन्होंने सियासत भी की लेकिन वहां भी उनका जी नहीं लगा। शायरी की दुनिया हमेशा उन्हें अपनी तरफ खींच लाती। ठेठ दिल्ली की खूबसूरत टकसाली जबान के शायर थे। उनकी शायरी में उर्दू अल्फ़ाज़ और मुहाबरों का खूबसूरत प्रयोग देखने को मिलता है।  

रुख़ हवा का ये कि जैसे उस को आसानी पड़े 
दिल की आग ऐसी कि हम को रोज़ सुलगानी पड़े 

नूर हो अंदर तो बाहर मात क्यूँ खानी पड़े 
वो तजल्ली क्या मियाँ जो तूर से लानी पड़े
 
ज़िंदगी की क़द्र तब तुम पर खुलेगी दोस्तों 
उस के कूचे से जब एक इक साँस मंगवानी पड़े
 
एक तो मुश्किल को झेलूँ और ऊपर से ये है 
अपनी मुश्किल रोज़ उस को जा के समझानी पड़े
 
ख़ुद वो मिलने आए तो हाएल रहे ये बे-ख़ुदी 
मैं जो मिलने जाऊँ तो रस्ते में हैरानी पड़े ।


खावर के तहँ जबान और बयान में कोइ फर्क नहीं है, इसीलिए उन्हें आम पाठक भी खूब पसंद करते हैं। शायरी की गंभीर समझ रखने वाले भी उनके कायल हैं।  

उस के आने पे भी नहीं आई 
दर्द में कुछ कमी नहीं आई 

उम्र भर दोस्तों ने मेहनत की 
पर हमें दोस्ती नहीं आई 

अपने ही घर पे आ निकलते हैं 
हम को आवारगी नहीं आई 

दोस्तों के किसी लतीफ़े पर 
आज हम को हँसी नहीं आई ।


21 जनवरी 2012 को उर्दू शायरी की दुनिया के इस चमकते सितारे ने अंतिम सांस ली। आम तौर पर वे ग़ज़ल कहते थे लेकिन उन्होंने कई जगह शेर भी कहे हैं।  

दो चार नहीं सैंकड़ों शेर उस पे कहे हैं 
इस पर भी वो समझे न तो क़दमों पे झुकें क्या 

जिस्मानी ताल्लुक़ पे ये शर्मिंदगी कैसी 
आपस में बदन कुछ भी करें इस से हमें क्या 


 
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