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काव्‍य जगत से जुड़े हुए वैचारिक लेख, समकालीन विषयों पर कवियों के दृष्टिकोण और वैचारिक मंथन

सावन स्पेशल: उमड़ घुमड़ बरखा आई...छाई घटा घनघोर

  • अनूप ओझा, अमर उजाला
  • बुधवार, 26 जुलाई 2017

लोक गीतों में प्रेम-माधुर्य, विरह पर आधारित कजरी का प्रयोग सावन में घिरने वाली काली घटाओं के रूप में किया गया है। मल्लार एक खास तरह की खुशी है। गांवों में धान की रोपाई करने वाली महिलाएं भी क्यारियों में मल्हार गाती हैं।

पथरीलीं राहें...हिम्मत देता कविताओं का यह गुलशन   

  • अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
  • बुधवार, 26 जुलाई 2017

साहित्य हमेशा प्रेरणा देने वाला होता है। मन में स्फूर्ति और ताजगी भर दे वही सर्वोत्तम साहित्य होता है। मनस्वी कवियों की बेहतरीन ओजस्वी कविताएं अवसाद में मनुष्‍य के मन को झकझोर कर जगाते रहती हैं।

दु‌नियादारी: ज़िंदगी की जद्दोजहद के 21 शेर

  • काव्य डेस्क-अमर उजाला, नई दिल्ली
  • बुधवार, 26 जुलाई 2017

हम तुम मिले न थे तो जुदाई का ‌था मलाल, अब ये मलाल है कि तमन्ना निकल गई

कबीर: प्रखर काव्य के तत्वशील चिंतक...समाज रौशन होता रहेगा    

  • अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
  • मंगलवार, 25 जुलाई 2017

एक सलाम, सड़कछाप शायरी के नाम... 

  • संजय अभिज्ञान, नई दिल्ली
  • मंगलवार, 25 जुलाई 2017

बुंदेली कवि 'सुगम' ने गांव की धड़कनों को ग़ज़लों में पिरोया 

  • रोहित कुमार पोरवाल, नई दिल्ली
  • मंगलवार, 25 जुलाई 2017

इब्ने इंशा: ख़ामोशी में ज़बान पैदा करने वाला शायर

  • अमर शर्मा, नई दिल्ली
  • मंगलवार, 25 जुलाई 2017

अरबी भाषा का श्रेष्ठतम जीवित कवि अदूनिस

  • अमर शर्मा, नई दिल्ली
  • शनिवार, 22 जुलाई 2017

अदूनीस में दुनिया को देखने का एक ऐसा मॉडर्न नज़रिया है जो पूरी मानवता के पक्ष में अपनी आवाज़ बुलंद करता है।

रघुवीर सहाय: ख़बरों को कविता में पिरोने वाला कवि

  • अमर शर्मा, नई दिल्ली
  • शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

रघुवीर सहाय की आधुनिक सभ्य समाज के लिए न्याय, समता, स्वतंत्रता, और बंधुत्व जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर उनकी गहरी आस्था थी। उन्होंने जहां भी इसका अभाव देखा, उसके ख़िलाफ़ आवाज उठाई।

वसीम बरेलवी: मैंने उसके हाथ चूमे और बेबस कर दिया

  • शोभित श्रीवास्तव, लखनऊ
  • शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

मशहूर शायर वसीम बरेलवी कहते हैं, "नफरतों को केवल मोहब्बत से जीता जा सकता है। हिंदुस्तान की सरजमीं ऐसी है कि यह ज़्यादा दिनों तक नफ़रत बर्दाश्त ही नहीं कर सकती।"

पीयूष मिश्रा से एक मुलाक़ात: दर्द की बारिशों में हम अकेले ही थे...

  • पूजा मेहरोत्रा, नई दिल्‍ली
  • गुरुवार, 20 जुलाई 2017

इश्क़ और हक़ीक़त: ज़िंदगी को अल्फ़ाज़ के सांचों में ढालते ये अश्आर

  • काव्य डेस्क-अमर उजाला, नई दिल्ली
  • गुरुवार, 20 जुलाई 2017

शराब-बारिश: बेहतरीन यादों के 21 शेर

  • काव्य डेस्क-अमर उजाला, नई दिल्ली
  • बुधवार, 19 जुलाई 2017
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