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Suresh Upadhyay on Missing his son

हास्य

हास्य कवि सुरेश उपाध्याय की कविता 'गुमशुदा की तलाश'

काव्य डेस्क / अमर उजाला, नई दिल्ली

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आज मेरा मन बड़ा उदास है
मेरा हंसना और मुस्कुराना कुछ कम हो गया है
मेरा भी एक बेटा था, वह गुम हो गया है
उसे गुमे एक महीना हो गया है
अभी तक किसी ने भी नहीं दिया है 
मुझे उसके पता

उसकी याद में मेरी आंखों की नींद 
हराम हो गई है
मुश्किल हो गया है मेरा जीना
वह केवल एक भाई अपना बहिन का है
वह हमेशा बैल बौटम पैंट पहनता है
पुस्तकें पढ़ने का उसे चाव नहीं है
रामायण-गीता से उसे कोई लगाव नहीं है
सूर या तुलसी के पदों को सुनकर 
वह कभी नहीं खिल सकता
मेरा बेटा किसी स्कूल के पास नहीं मिल सकता ।

मेरा बेटा बड़ा राजा है
 शायद किसी फड़ में बिराजा है
वह बहुत चंचल है, शोख है
रमी खेलने का उसे बचपन से शौक है
उसको दोनों कंधे
पंतग की डोर लपेटनेवाले हिचके-से हैं
भरी जवानी में उसके गाल पिचके-से हैं
फिल्मों के गीतों को वह हमेशा गाता है
वह इश्क़ का जनरेटर है
प्रेम की पोथी के पाठों को पढ़ाता है
पता नहीं कहां भटक रहा होगा
उसका हाथ 
शायद किसी की जेब में अटक रहा होगा ।

(सुरेश उपाध्याय की हास्य कविता 'गुमशुदा की तलाश' के ये चुनिंदा अंश हैं, जो 'यार सप्तक' नाम की किताब से लिए गए हैं। यह किताब डायमंड पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुई है।)
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