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Satire of Surendra Mohan Mishra

हास्य

सुरेन्द्र मोहन मिश्र: एक कवयित्री सम्मेलन में पधारने का आदेश...

काव्य डेस्क / अमर उजाला, नई दिल्ली

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बांग्लादेश की तरह से 
एक नया स्वतंत्र राज्य
बना था महिला देश
जिसके राष्ट्र ध्वज में लहराते थे काले केश
वहीं से मिला था हमें 
एक कवयित्री सम्मेलन में पधारने का आदेश ।
पत्र पाकर हमारा मन खिल गया
क्योंकि एक कवि को
कवयित्री सम्मेलन का निमंत्रण मिल गया

महिला देश के स्टेशन पर
महिलाओं के झुंड देखकर 
हमें हो गया अचम्भा
हम प्लेटफ़ार्म पर ही खड़े हो गए
पकड़कर बिजली का खम्बा

यहां टी.टी और गार्ड थीं उर्वशियां
कुलियों की जगह थीं सुकोमल मेनकाएं
और पुलिस वाली थी रम्भा
कुछ नारियां हमें बदतमीजी से घूरे जा रही थीं
कुछ हमें देखकर सीटियां बजा रही थीं
एक पुलिस वाली
हमसे करने लगी ठिठोली
आंखे तरेकर बोली :
"इस शहर में नए हुए लगते हो ?
शायद कहीं से भगाए हुए लगते हो ?
दस रुपये का नोट देकर ही निकलना होगा
नहीं तो सीधे कोतवाली चलना होगा ।"

(सुरेन्द्र मोहन मिश्र की हास्य कविता 'कवयित्री सम्मेलन' के ये चुनिंदा अंश हैं, जो 'यार सप्तक' नाम की किताब से लिए गए हैं। यह किताब डायमंड पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुई है।)
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