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Hindi poet and lyricist Pandit Narendra Sharma proposed Vividh Bharati

काव्य चर्चा

पं. नरेंद्र शर्मा : रेडियो प्रोग्राम 'विविध भारती' का आइडिया देने वाले गीतकार

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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यशोमती मैया से बोले नंदलाला,
राधा क्यूँ गोरी, मैं क्यूँ काला |

बोली मुस्काती मैया, ललन को बताया,
काली अँधेरी आधी रात को तू आया |
लाडला कन्हीया मेरा काली कमली वाला, इसी लिए काला ||

बोली मुस्काती मैया, सुन मेरे प्यारे,
गोरी गोरी राधिका के नैन कजरारे |
काले नैनो वाली ने ऐसा जादू डाला, इसी लिए काला ||

इतने में राधा प्यारी आई बलखाती,
मैंने क्या जादू डाला, बोली इख्लाती |
मैया कन्हीया तेरा जग से निराला, इसी लिए काला || 


फिल्म 'सत्यम शिवम् सुंदरम' के लिए ये गीत पं. नरेंद्र शर्मा ने लिखा था। गीत को स्वर दिया था लताजी ने। नरेंद्र शर्मा ने कई फिल्मों के गीत लिखे। उन्हीं का लिखा फिल्म 'ज्वारा भाटा' के लिए गीत 'नैया को खेवैया के किया हमने हवाले' खासा लोकप्रिय हुआ था। 28 फरवरी 1913 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के खुर्जा, जहांगीरपुर में जन्मे पं. नरेंद्र शर्मा ने इलाहबाद विश्वविद्यालय से शिक्षाशास्त्र और अंग्रेजी में एम.ए. करने के बाद 1913 में प्रयाग में 'अभ्युदय' पत्रिका के सम्पादन से जुड़ गए। नरेंद्र शर्मा के जीवन को यहीं से नई दिशा मिली। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी स्वराज्य भवन में हिंदी अधिकारी भी रहे। फिल्मों में गीत लिखने के साथ-साथ स्वतंत्र लेखन भी करते रहे। सुप्रसिद्ध साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा के प्रोत्साहन और आग्रह पर पं. नरेंद्र शर्मा मुंबई आ गए और यहीं बस गए। फ़िल्मी लेखन के साथ-साथ आकाशवाणी से भी जुड़े रहे।  3 अक्टूबर 1957 भारतीय रेडियो प्रसारण के क्षेत्र में एक सुरीला अध्याय जुड़ा 'विविध भारती' नाम से। 'विविध भारती' का प्रस्ताव पंडित नरेंद्र शर्मा ने दिया था।  

आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे? 
आज से दो प्रेम योगी, अब वियोगी ही रहेंगे! 
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे? 
सत्य हो यदि, कल्प की भी कल्पना कर, धीर बांधूँ, 
किन्तु कैसे व्यर्थ की आशा लिये, यह योग साधूँ! 
जानता हूँ, अब न हम तुम मिल सकेंगे! 
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे? 
आयेगा मधुमास फिर भी, आयेगी श्यामल घटा घिर, 
आँख भर कर देख लो अब, मैं न आऊँगा कभी फिर! 
प्राण तन से बिछुड़ कर कैसे रहेंगे! 
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे? 
अब न रोना, व्यर्थ होगा, हर घड़ी आँसू बहाना, 
आज से अपने वियोगी, हृदय को हँसना सिखाना, 
अब न हँसने के लिये, हम तुम मिलेंगे! 
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे? 

'प्रवासी के गीत', 'मिट्टी और फूल', 'अग्निशस्य', 'प्यासा निर्झर', 'मुठ्ठी बंद रहस्य' नरेंद्र शर्मा की प्रमुख काव्य रचनाएं हैं। 'मनोकामिनी', 'द्रौपदी', 'उत्तरजय सुवर्णा' उनके प्रबंध काव्य हैं। "शंखनाद ने कर दिया, समारोह का अंत, अंत यही ले जाएगा, कुरुक्षेत्र पर्यन्त" यह दोहा उनके जीवन की अंतिम रचना है, जिसे उन्होंने धारावाहिक 'महाभारत' के लिए लिखा था। जब बी.आर. चोपड़ा महाभारत बना रहे थे तो नरेंद्र शर्मा उसमें सलाहकार की भूमिका निभा रहे थे। ये बी.आर. चोपड़ा के घनिष्ठ मित्रों में से थे। 11 फरवरी, 1989 ई. को ह्‌दय-गति रुक जाने से उनका देहावसान हो गया।   

हुए हैं पराये मन हार आये 
मन का मरम जाने ना माने ना माने ना नैना दीवाने 
जाना ना जाना मन ही ना जाना 
चितवन का मन बनता निशाना 
कैसा निशाना कैसा निशाना,   
मन ही पहचाने ना, माने ना माने ना नैना दीवाने  

जीवन बेली करे अठखेली महके मन के बकुल
प्रीति फूल फूले झूला झूले, चहके बन बुलबुल,
महके मन के बकुल 
मन क्या जाने, क्या होगा कल धार समय की बहती पलपल,
जीवन चँचल जीवन चँचल, दिन जाके फिर आने ना 
माने ना माने ना नैना दीवाने।

बतौर गीतकार फिल्मों के लिए उन्होंने जो पहला गीत लिखा- 

ऐ बादे तबा, इठलाती न आ 
मेरा गुंचय दिल तो सूख गया 
मेरे प्यासे लबों को छूए बिना 
पैमाना खुशी टूट गया   

पंडित नरेंद्र शर्मा की भाषा संस्कृतनिष्ठ थी, वे हिंदी में लिखते थे, एक-दो गीतों में उर्दू के भी शब्द हैं। हमारी बात, रत्नघर, फिर भी, ज्वार भांटा, सजनी, मालती माधव, चार आँखें, मेरा सुहाग, बिछड़े बालम, चूड़ियां, जेल यात्रा, भाई-बहन, सत्यम शिवम् सुंदरम जैसी कई फिल्मों के लिए उन्होंने गीत लिखे। 1961 में आई फिल्म 'भाभी की चूड़ियां' के लिए उन्होंने ये गीत लिखा था। गीत 'ज्योति कलश छलके' बहुत लोकप्रिय हुआ-  

ज्योति कलश छलके  
हुए गुलाबी-लाल-सुनहरे 
रंग दाल बादल के 
ज्योति कलश छलके 



1982 के एशियन गेम का थीम सांग भी पंडितजी ने ही लिखा- 

अथ स्वागतम, शुभ स्वागतम 
आनंद मंगल मंगलम 
नित प्रियं भारत भारतम
 
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