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हास्य

लघुत्तम व्यंग्यः बेगुरु

बरुण सखाजी

5 कविताएं

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गुरु खोजत खोजत कलप गया जो बीत
भीतर ही रच डालिए अपना-अपना संगीत
अपना-अपना संगीत, कहत बरुण बौराय
घन्टालों से अच्छओ तो बेगुरु ही रह जाए
@सखाजी
sakhajee.blogspot.in
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