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famous poet waseem barelvi at firaq international award ceremony

हलचल

मीडिया ने समाज को तीन पायों की कुर्सी पर बैठाया : वसीम बरेलवी

आशुतोष मिश्र, गोरखपुर ब्यूरो

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‘खुल के मिलने का स़लीका आपको आता नहीं 
और मेरे पास कोई चोर दरवाज़ा नहीं।’ 


50 बरस से अदबी मंचों को अपने अशआर से तर करने वाले प्रो. वसीम बरेलवी ने तब और अब पर जो कहा उसे सुनकर उनका ये शेर याद आ गया। एक कार्यक्रम के सिलसिले में वो शनिवार को फ़िराक़ गोरखपुरी के शहर गोरखपुर में थे। इस मौक़े पर फ़िराक़ इंटरनेशनल अवार्ड से सम्मानित मशहूर शायर प्रो. वसीम बरेलवी अपने अंदाज में अदबी दुनिया की नई पीढ़ी को मुकाम पाने के लिए साधना और समर्पण की सीख दे गए। उन्होंने मंच के अतीत से लेकर वर्तमान पर तफसील से बात की। 

प्रो. वसीम बरेलवी बोले, "वक्त हमेशा एक सा नहीं होता। तकाज़े बदलते रहते हैं। जिस तरह से तब और अब में समाजिक सरोकार के तकाज़े बदले हैं उसी तरह से मंच में भी फ़र्क आया है। उस वक़्त लोग ज़बान और बयान की ख़ूबसूरती पर निगाह रखते थे। सुनने वाले इल्म़ी और अदबी होते थे।" 

उन्होंने अदबी साहित्य के बेहतर भविष्य की उम्मीद जताई। कहा, "मुशायरों में हज़ार से डेढ़ हज़ार युवाओं की मौजूदगी बताती है कि अच्छी फजा बन रही है। बड़ी तादाद में युवाओं का जुटना बताता है कि नई नस्ल शायरी में ख़ुद को पहचानने की कोशिश कर रही है, यह उम्मीद भरी बात है। ज़रूरत है कि वो इंटरनेट के साथ किताबें भी पढ़ें।" 
प्रो. बरेलवी बोले, "तीन नस्लों ने मुझे सुना है। जिन नस्लों ने भी सुना उसी मोहब्बत से सुना। अगर वक़्त के साथ आप पूरी ईमानदारी से शायरी कर रहे हैं तो कभी अप्रासंगिक नहीं होंगे। आज की नस्ल में जल्दबाज़ी है। नए कहने वाले जल्द वो मकाम हासिल करना चाहते हैं जो उन्हें प्रेरणा देने वालों का है। साहित्य, कला और अदब में कोई चोर रास्ता नहीं है। ज़रूरत है अदब का मुताअला करें। देखें बुजुर्गों का रास्ता क्या था? और बात ख़त्म होती है... 

‘जरा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है,
समंदरों ही के लहजे में बात करता है।’ 

हिंदी-उर्दू में टकराव लोगों की राजनीतिक मजबूरी

हिंदी-उर्दू में टकराव की बात को वह सिरे से ख़ारिज करते हैं। कहते हैं कि साहित्य इंसान और इंसानियत की बात करता है। शायरी और कविता ने सिर्फ़ इंसान और इंसानियत की बात करते हुए सकारात्मकता को जीता है। साहित्य का यह रवैया आदमी के जीवन के साथ समाज को आगे बढ़ाता है। हिंदी-उर्दू में टकराव की बातें लोगों की राजनीतिक मजबूरियां हो सकती हैं। 

मीडिया ने समाज को तीन पायों की कुर्सी पर बैठाया 

उन्होंने मीडिया को नसीहत देते हुए कहा कि समाज को तीन पाये की कुर्सी पर बैठा दिया गया है। राजनीति, फ़िल्म और खेल का मैदान। इसमें मीडिया अगर चौथा पाया अदब और साहित्य का लगा दे तो यह समाज की बहुत बड़ी सेवा होगी। आज के दौर में हमने अपने आदर्शों को भी इख़्तिलाफ़ी बना दिया है। बिना आदर्श के समाज विकास नहीं कर सकता। ऐसे में आज सकारात्मकता की लंबी लाइन खींचने की ज़रूरत है। 

हुकूमत की सरपरस्ती से नहीं चलती ज़बान 

उर्दू पर सरकारों के ध्यान न देने के सवाल पर बोले, हुकूमत की सरपरस्ती से कोई ज़बान नहीं चलती। ये कोई तालाब नहीं नदी है। जिस ज़बान में ज़िंदा रहने की ताक़त होती है वो जीती है। अपने रचनाकारों के दम पर, अपने चाहने वालों के दम पर। 

फ़िल्में शेरो-शायरी की कसौटी नहीं

फ़िल्मों में शेर-ओ-शायरी को काफी मौक़ा मिला है। फ़िल्में समाज को संदेश भी देती रही हैं, लेकिन उनकी शायरी आइडियल नहीं होती। अदब हमेशा रही है, फ़िल्म तो वक़्त के साथ चलती है। उन्होंने अमिताभ बच्चन के पिता हरिवंश राय बच्चन की कविताएं गाने के बयान का ज़िक्र किया। कहा कि तब उन्होंने पुत्र का पिता के प्रति प्रेम मानते हुए इस बात की सराहना की थी, लेकिन बतौर साहित्यकार इस पर दुख जताया था। अमिताभ इस सदी के महानायक हैं लेकिन हरिवंश राय बच्चन हर सदी के महानायक हैं।
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