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Umberto Eco book review,  famous philosopher and novelist of Italy

इस हफ्ते की किताब

पिता को अपनी किताबें पढ़ते देखना आह्लादकारी क्षण था

प्रवाह डेस्क/ अमर उजाला

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मेरे जीवन पर मेरे दादा जी का काफी प्रभाव पड़ा। हालांकि जब मैं महज छह साल का था, तभी उनका देहांत हो गया।

वह दुनिया के बारे में जानने के लिए बेहद उत्सुक रहते थे और ढेर सारी किताबें पढ़ते रहते थे। किताबों से उन्हें इतना लगाव था कि रिटायर होने के बाद उन्होंने जिल्दसाजी का काम शुरू कर दिया। उन्हीं के पास पहले-पहल मैंने किताबें देखीं।

उनके निधन के बाद जिल्दसाजी के लिए आई बहुत सी किताबों के मालिक उन्हें लेने नहीं आए। नतीजतन उन किताबों को घर में एक बड़े संदूक में रख दिया गया, जो मेरे माता-पिता को मिला। मैं अक्सर किताबों के उस खजाने को खोलता था। उसमें मेरे दादाजी की बहुत सी पत्रिकाएं भी थीं। किताबों के उसी खजाने ने पहली बार मुझे कहानियों की दुनिया से परिचित कराया।

पढ़ने के शौकीन मेरे पिता भी थे, लेकिन खरीदने के पैसे नहीं होने के कारण वह विभिन्न दुकानों पर जाकर खड़े होकर किताबें पढ़ते थे। उनकी वह छवि आज तक मेरे मन में बसी है। कभी-कभी मेरे पिता अपने मित्रों से उधार मांगकर उपन्यास पढ़ते थे। मेरे पिता की मृत्यु से पहले मेरी कुछ किताबें प्रकाशित हो चुकी थीं।

एक दिन मैने देखा कि वह देर शाम उन किताबों को पढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। यह मेरे लिए काफी आह्लादकारी क्षण था। मुझे ऐसा लगा कि मैंने कर्ज चुका दिया है और मैंने उनकी इच्छा पूरी की है। अगर वह मेरे उपन्यासों को पढ़ पाते, तो शायद उन्हें और ज्यादा खुशी होती। मेरे पिता के निधन के दस वर्ष बाद तक मेरी मां जीवित थीं और उन्हें यह भरोसा था कि मैं ढेर सारी किताबें लिखूंगा। 

- उम्बर्तो इको- इटली के मशहूर दार्शनिक और उपन्यासकार
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