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 i m astronaut: a glimpses of poetry wit of arvind joshi 

इस हफ्ते की किताब

मैं एस्ट्रोनॉट हूं: समकालीन काव्य रचना के मापदंडों पर खरा उतरता काव्य संग्रह 

शरद मिश्र, नई दिल्‍ली

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अज्ञानता एक सिलसिलेवार जोखिम है। जीवन में यह हर जगह, हर समय जारी रहता है। 'मैं एस्ट्रोनॉट हूं' काव्य संग्रह के ज‌रिए अरविंद जोशी ने इस जोखिम को भांपते हुए ज्ञान और अज्ञान के बीच के अंतर को साहस के साथ समझने की कोशिश की है। अरविंद जोशी मीडिया और साहित्य दोनों में समान दखल रखते हैं। लिहाजा उनके काव्य संग्रह 'मैं एक एस्ट्रोनॉट हूं' में आपको जीवन दर्शन के बारीक एहसास बेहतरीन शब्द-रूपक और उपमाओं के साथ सटीक संयोजन में मिलते हैं। संग्रह की हर कविता कुछ खास निष्कर्ष लिए हुए है।

नई विधाओं और नए लेखन में अरविंद जोशी की रूचि इस संग्रह के जरिए साफ झलकती है। क्राइम, रोमांच, इरोटिक साहित्य, गीत, पहेली, परीकथा और पत्रकारी लेख का सुंदर प्रयोग इनके इस संग्रह में शामिल हैं। जोशी के पास संस्कार के बोलियों की कमी नहीं है। वह ऐतिहासिक घटनाक्रमों का भी विस्तार से बोध रखते हैं। इस वजह से उनके इस काव्य संग्रह को अनुभवों का एक लघु साहित्य कहा जा सकता है।

दिल्ली के शहरी परिवेश का चिट्ठा, देश की राजनीतिक उथल पुथल, विरासत पर प्रश्नचिन्ह खड़े करने का माद्दा और इश्क के दैहिक रसायन का विश्लेषण इस कविता संग्रह का अभिलाक्षणिक गुणधर्म है। कविता संग्रह में कुछ इतिहास के मध्ययुगीन दोहे और काफी सारी आधुनिक आजाद नज्में भी हैं। संग्रह समकालीन काव्य रचना के सभी मापदंडों को भलिभांति व्यक्त करता है। यह पाठकों को एक नई ऊर्जा-नई अपेक्षा के स्रोत में निश्चित रूप से सहेजने में कामयाब होगा।

'उस मार्च खूब फबी दिल्ली' में जोशी ने शहर की आबो हवा और प्रेमभाव को एक करने कोशिश की है। वहीं 'यह पथ नि:शब्द जाता है' में जीवन के अनवरत बहने के क्रम को आलोकित किया है। 'तीन प्रश्न है बंधु' में कवि ने जीवन दर्शन को स्पष्ट किया है। 'अब वो उम्र नहीं में' जिंदगी और समय के कारवें के बीच बदल रही तस्वीर को उकेरा है। 'फूले अमलतास' में दिल्ली में अमलतास से प्रकृति में होने वाले बदलाव को सामने रखा है। इसके अलावा 'जो मुझे सुनती है आजकल', 'मैं रोज यहां करवट कर सोता हूं', 'सुनो, माधो'। 'मैं औचित्य गीत नहीं करता', 'तू हर एक मुंह ना लगती', 'अन्ना जावे जेल हमारो', 'इलाके में कुत्ते तीन तरह के हैं', 'मूषक भाषा सीख गयो है', 'और ये ठेंगा मेरा', 'तू मेरा पक्षधर', 'विश्वास', 'स्थिरता में भी', 'सुनो सबरे पंच, सजग कुटुम्बा', 'हेमंती', 'लाक्षागृह', 'द्रौपदी की मछली', 'चौपड़', 'इंद्रप्रस्‍थ', 'महाभारत युद्ध नहीं' आदि रचनाएं अरविंद जोशी का जीवन के प्रति संपूर्ण अनुभव सामने रखती हैं।

हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं पर बेहतर पकड़ रखने वाले अरविंद की इन रचनाओं में भाषा की चपलता नहीं बल्कि कुशलता देखने को मिलती है। सरसरे भाव से चटपटे शब्दों में कविता कह देना अरविंद जोशी का लक्ष्य नहीं है। कविता के काव्य बोध और सामाजिक सरोकार से अरविंद जोशी भलिभांति परिचित हैं। यह इस काव्य संग्रह में स्पष्ट झलकता है। अंडर ग्राउंड साहित्य में इनकी रुचि है। पत्रकारिता के साथ मीडिया के तकनीक पहलुओं पर भी गहरी समझ रखने वाले जोशी का यह काव्य संग्रह एक तरह से आधुनिक परिवेश में जीवन के सभी कालखंडों की गहन सोच को व्यक्त करता है।          
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