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book review on macaulay elphinstone and indian education

इस हफ्ते की किताब

मैकॉले को ख़लनायक माना जाए या महानायक?

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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एकेडमिक डिस्कोर्स में अक्सर एक सवाल खड़ा होता है कि मैकॉले को ख़लनायक माना जाए या महानायक? वे एक साधारण लेखक थे या महज़ एक अंग्रेज़ अफ़सर? मैकॉले भारत के इतिहास का एक मुख्य और विवादास्पद हिस्सा बने रहे हैं। बुद्धिजीवि वर्ग के एक तबके में ऐसी धारणा है कि भारत को आज़ाद हुए 70 साल बीत गए और इस दौरान हमारी शिक्षा व्यवस्था में कोई मौलिकता नहीं उभर पाई है। यह धारणा मज़बूत हुई है कि भारतीय शिक्षा प्रणाली मैकॉले, वुड, सार्जेण्ट, बेंटिक व ऐलफिन्सटन के विचारों तले चरमरा रही है। ये सवाल भी उठे हैं कि आख़िर इन लोगों ने ऐसे कौन से क़दम उठाए जिनसे भारत में शिक्षण, ज्ञान-निर्माण और अन्य सभी बौद्धिक कार्य कुंद पड़ गए?  मैकॉले को किस नज़रिए से देखा जाए यह कहना सचमुच बहुत कठिन है। 

यदि आप आज तक इस दुविधा में नहीं थे तो वाणी प्रकाशन की नई किताब 'मैकॉले, एलफिन्सटन और भारतीय शिक्षा' के लेखों को पढ़कर इन अलग-अलग नज़रियों के बारे में सोचना ज़रूर शुरू कर देंगे।

मैकॉले को शिक्षा जगत के लगभग हर सेमिनार और चर्चाओं में कोसा जाता है। यह कहा जाता है कि आज हमारी शिक्षा व्यवस्था के सामने जो चुनौतियां हैं और इसकी जो स्थिति है उसकी बदहाल ज़िम्मेदारी मैकॉले की ही है। यह सवाल पूछना लाज़मी है कि क्या यह एक संतोषजनक जवाब माना जाए? मैकॉले की शिक्षा पद्धति के वे कौन से महत्वपूर्ण पहलू हैं जो हमारी आज की शिक्षा व्यवस्था से ऐसे चिपक गये हैं कि हम सब चाह कर भी उनसे अलग नहीं हो पा रहे हैं। या फिर मैकॉले का नाम सिर्फ़ एक बहाना है और असल में हम सभी लोगों को शिक्षा में शामिल ही नहीं करना चाहते? शिक्षा के संवादों और परिचर्चाओं में संवैधानिक लक्ष्यों को हासिल करने के संबंध में लाचारी नज़र आती है। इस लाचारी का ठीकरा मैकॉले के सिर फोड़कर निश्चिंत होना किस हद तक उचित है?

'मैकॉले, एलफिन्सटन और भारतीय शिक्षा' पुस्तक में 18 चर्चित विद्वानों के लेख हैं। आगे पढ़ें

5 सदस्यीय संपादक मंडल ने किताब का संपादन किया है

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