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Book review of pani udas hai book written by Akhileshwar Pandey

इस हफ्ते की किताब

पानी उदास है: सरल शब्दों के साथ सच के गूढ़ रहस्य

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कम उम्र के नए कवियों ने अपनी सृजन क्षमता से साहित्य के आकाश में सरल शब्दों के साथ सच के गूढ़ रहस्यों को जानने और समझने की कोशिश की है। 'पानी उदास है' कविता संग्रह इसी क्रम में एक बेहतर साहित्य साधना कही जा सकती है। जिन कवियों से अभी की हिंदी कविता का मानचित्र बनता है, उनमें सबसे आरंभिक नाम अखिलेश्वर पांडेय का है। पानी उदास है संग्रह में अखिलेश्वर पांडेय ने जो कविताएं लिखी हैं, वह एक नई विषय वस्तु तथा नए कथन के रूप में लिखी गई हैं।

इन कविताओं में एक साथ गहरा प्रेम और गहरा रोष व्यक्त किया गया है। यह कविताओं का ऐसा समूह है, जो लोगों को रोकने में पूरी तरह समर्थ है। पेशे से पत्रकार अखिलेश पांडेय ने इस संग्रह में बेहद मर्मस्पर्शी कविताएं लिखी हैं, जो उनके पेशे का अनुभव व्यक्त करती हैं। 'पानी उदास है' ऐसा काव्य संग्रह है जो पाठकों को नए कलेवर के साहित्य का रसास्वादन कराता है। 

पानी उदास है 

'कहन के बिना कहानी उदास है
रोजगार के बिना जवानी उदास है 
टूट गए सपने, उम्मीदें उदास है 
मेरे देश की आंख का पानी  उदास है' 


मां-पिता को समर्पित इस संग्रह में नितांत एक युवा कवि की सोच समाहित है। युवा कवियों की आज अमूमन सोच है कि कविता प्रतिरोध का प्रारूप हो सकती है लेकिन वह सदैव आक्रामक नहीं हो सकती। उनका मानना है कि आक्रामकता किसी समस्या या वस्तु का समाधान नहीं होता। ऐसी सकारात्मक सोच को किताब में कविताओं के जरिए पेश किया गया है। बेहद सादगी से इनका सृजन किया गया है। संग्रह की कविताएं कुछ पल में ही बिसर नहीं जाती। दूर तलक मन में तरंगों की हिचकोले खाते रहती हैं।

पुस्तक के रचनाकार को कविताओं से पाठकों को जोड़ने की कला बखूबी आती है। नारी विमर्श की कैद को इसकी कविताएं सुलझाने की कोशिश करती हैं। नूतन समय में नई मशाल लिए यह कविताएं सभी लड़कियों के लिए एक खुला मंच मुहैया कराती हैं। 'सुनो लड़कियों' में कवि ने लड़कियों पर लगी बंदिशों का उल्लेख किया है। उन्होंने लड़कियों के प्रति समाज के व्यवहार पर संवेदनशील दृष्टि डाली है। कवि लड़कियों को पुराने जमाने की सोच में बांधे रखने पर क्षुभित है।

सुनो लड़कियों

'शोर नहीं
धीमे बोलो
ऊंची आवाज
शोभा नहीं देता तुम्हें
ये क्या 
अभी तक रोटी सेंकना भी 
सीखा नहीं तुमने
जाओ
गिलास में पानी भरके
बाप-भाईयों को पिलाना सीखो
जींस-टी शर्ट पहनकर
रिश्तेदारों के सामने
आना भी मत कभी 
जाओ 
सलवार-शूट
साड़ियां पहनना सीखो 
फेसबुक, वाट्सअप
क्या करना इन सबका 
औरत ही रहो तो अच्छा' 


कविता में प्रेम एक महक या खूश्बू की तरह होता है। पानी उदास है संग्रह में प्रेम को परोसा गया है। पानी उदास है का 'पानी' प्रेम के अलावा अन्य संदर्भों में भी व्यक्त किया गया है। 

तुम रहती हो मेरे साथ 

'मैं जब भी 
जहां कहीं जाता हूं
तुम रहती हो मेरे साथ
जब मैं 
सड़कों पर होता हूं
घर बाजार या किसी काम में होता हूं 
तुम्हारी समीपता को महसूस करता हूं 
हर बार 
वापस घर लौटकर 
कमरे के अपने एकांत में 
तुम्हारी कोमल यादों के सहारे 
गुलाब सा महकता हूं'
 

भूख, भय, भ्रष्टाचार, अमानवीय व्यवहार आदि के अनुभवों के बीच कवि सिर्फ इसलिए ही विद्रोही नहीं बनता कि उसे बस यह औपचारिकता निभानी है, बल्कि वह पूरा बदलाव चाहता है। वह कविता में बार-बार लिखना शब्द प्रयुक्त करता है, जो उनकी वैचारिक मीमांसा को जाहिर करता है। संग्रह की कई कविताएं सच का मंजर हमारी आंखों के सामने पेश करती हैं।

कविताएं हम किस खबर की प्रतीक्षा में हैं, जो कहना है मुझे, ओ मेरी गौरेया, मैं कवि हूं, मुझे लिखना है, वे और उनकी बातें, वह कौन था, आंखों भरा आकाश, मौन के विन्यास में, चुनौतियों के विरुद्ध, तुम रहती हो मेरे साथ, तुम्हें पहली बार देखा तो सहित अन्य कविताएं अखिलेश्वर पांडेय की मूल रचना है। जिनमें मौलिकता बरकरार है। कहने का तात्पर्य सीधा और स्पष्ट है। सरल शब्दों में गूढ़ अर्थ के साथ बातें कही गई हैं। ईश्वर, सच, परिवर्तन, नव वर्ष, काला धन, समय, गांव और शहर, शब्द और जात शीर्षक की कविताओं पर भी जीवन को सहज करने वाले भाव व्यक्त किए गए हैं।
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