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आतंकियों को मरवाने वाला शाह खुद दर-बदर

Jammu

Updated Thu, 15 Nov 2012 12:00 PM IST
जम्मू। वर्ष 2004 में जब पूरी रियासत आतंकी वारदातों से जल रही थी, उस वक्त देश के दुश्मनों को मरवाने में अहम भूमिका अदा करने वाले कालाकोट के लाल शाह को इस बात का मलाल है कि बीएसएफ ने अपने वादे के अनुसार कुछ नहीं किया। हालांकि वह सेना का शुक्रगुजार है, जिसने आतंकी हमले में उसकी खोई टांग का दो साल तक इलाज किया, लेकिन बीएसएफ ने न नौकरी दी और न ही मकान।
आज हालत यह है कि शाह अब अपंग होने के कारण दूसरों के रहमोकरम पर आश्रित है। लाल शाह की माने तो उसने जैश-ए-मोहम्मद के जिन पांच खूंखार आतंकियों को मरवाया, उसमें से दो ही उसके खाते में आए, जबकि तीन अन्य सुरक्षा बलों ने अपने नाम कर लिए। बीएसएफ के तत्कालीन एसपी द्वारा जारी
प्रमाण पत्र दिखाते हुए शाह कहते हैं कि उन्हें अपनी टांग गंवाने (आपरेशन के बाद लगभग 2-3 इंच छोटी हो चुकी) का गम नहीं है, लेकिन मलाल इस बात का है कि जान की बाजी खेलकर जिन आतंकियों को मरवाया, उन्हीं आतंकियों को अन्य लोगों ने संरक्षण दिया। इसके कारण उनके घर पर हमला हुआ और हमले में उसके भाई की मौत हो गई।
कई बार बीएसएफ के दिल्ली कार्यालय में भी पत्राचार किया, लेकिन आजतक उसे कुछ मदद नहीं मिली और वह इलाके के लोगों की मदद पर आश्रित है। उसकी पत्नी लोगों के घरोें में बर्तन मांज कर गुजारा कर रही है।
लाल शाह ने कहा कि जिन लोगों ने आतंकियों की मदद की, वह आज भी गांव में ऐश कर रहे हैं, जबकि सरकार उसे कुछ भी मदद नहीं कर रही। शाह के अनुसार कई सालों तक दौड़ धूप करने के बाद सिर्फ विस्थापित के नाम पर उसे एक हजार रुपये राहत मिलनी शुरू हुई है। उनका कहना है कि सिर्फ कश्मीर से विस्थापित होकर जम्मू पहुंचे कश्मीरी पंडितों को नौकरी के अलावा लाखों रुपये की मदद मिल रही है, लेकिन देश के लिए अपना सब कुछ गंवाने के बावजूद आज दर-दर की ठोकर खाने को मजबूर हैं।
शाह कहता है, ‘आतंक प्रभावित बरोह ब्लाक के तत्ता पानी गांव में कभी किसी ने सेना की मदद नहीं की थी। मेरे साथ आतंकियों ने जो सलूक किया, उसके बाद किसी ने सेना को सूचना देना तो दूर, उस इलाके से नहीं गुजरते थे, जहां सेना की चौकी होती थी।’
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