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23 साल के बाद पोखरीबल मंदिर में बजी घंटियां

Sri nagar

Updated Mon, 01 Oct 2012 12:00 PM IST
श्रीनगर। 23 सालों के अंतराल के बाद आज रैनाबाड़ी में स्थित हिंदुओं के एक प्राचीन अमृतकुंड पोखरीबल मंदिर में हवन भंडारे का आयोजन हो सका। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के सहयोग से रविवार को संपन्न हुई पूजा अर्चना से हिंदू श्रद्धालु ही नहीं, इलाके में रहने वाले मुस्लिम तथा सिख समुदाय के लोग भी खुश नजर आए। राज्य में आतंकवाद पनपने से पूर्व 1988 तक इस पवित्र स्थल पर हवन यज्ञ का पवित्र कार्यक्रम आयोजित होता रहा है। कश्मीरी पंडितों के घाटी से पलायन कर जाने के बाद आतंकी खतरे के कारण लंबे समय तक यहां कोई भव्य समारोह का आयोजन नहीं किया जा सका था।
23 सालों के इंतजार के बाद एक बार फिर मंदिर की घंटियां बज उठीं। एक बड़ी भीड़ ने इसमें भाग लिया। मंदिर परिसर में रात भर हवन चलता रहा। कई पंडितों ने पूरी श्रद्धा तथा हिंदू रीति रिवाज के साथ हवन की आज दोपहर पुर्णाहुति दी। हवन के बाद भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें लगभग हजार के करीब लोगों ने भाग लेकर प्रसाद खाया। आसपास के मुस्लिम भी मंदिर में लौट आई रौनक को देख खुश नजर आए।
मंदिर कमेटी के प्रधान अशोक कुमार रैना ने बताया कि मंदिर में 23 सालों के बाद भव्य हवन यज्ञ का आयोजन संपन्न हो सका है। उनके अनुसार मंदिर का निर्माण 1877 के करीब महराजा रणवीर सिंह ने करवाया था। मंदिर के नीचे शारिका माता के चरण पादुका हैं। 1989 से पूर्व तक साल में दो बार नवरात्रों के दौरान इसमें हवन यज्ञ का आयोजन होता रहा है, लेकिन इस बार लंबे समय के बाद मंदिर में हवन भंडारे का आयोजन किया जा सका। आतंकी हमले के बाद 90 के दशक में मंदिर की सुरक्षा का जिम्मा सेना, सीमा सुरक्षा बल और अब केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के हवाले रहा है। वैसे तो 82 बटालियन की ई कंपनी को इस समय मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था के लिए तैनात किया गया है, लेकिन बल के जवान ही लंबे समय से मंदिर की सफाई तथा पूजा अर्चना का कार्य संपन्न करवाने में सहयोग करते रहे हैं।
कंपनी के सहायक कमांडेंट एस सिंगारएवेल कहते हैं कि हम लोग आज मंदिर में लौट आई रौनक से बहुत प्रसन्न है। लगभग चार वर्ष पूर्व मेरी यहां तैनाती हुई थी, लेकिन इतनी रौनक हमने पहले कभी नहीं देखी है। हम चाहते हैं कि शुरू हुआ यह धार्मिक कार्य अब कभी बंद न हो।
पोखरीबल के स्थानीय निवासी रिटायर्ड अधिकारी 80 वर्षीय रतन सिंह बाली का कहना था कि 1990 से पूर्व इस मंदिर में साल में दो बार भव्य कार्यक्रम आयोजित होते थे, जिसमें सभी धर्मों के लोग भाग लिया करते थे।
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