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फंड के फंडे में फंसे 231 स्कूल

Rajouri

Updated Wed, 01 Aug 2012 12:00 PM IST
राजोरी। जोर-शोर से शिक्षा विभाग ने दस साल पहले सर्व शिक्षा अभियान योजना शुरू की थी। योजना के तहत पांचवीं और आठवीं तक के स्कूलों की हालत सुधारने की कोशिश की गई। कुछ स्कूलों को अपग्रेड किया गया और कई स्कूल नए खोले गए, लेकिन हकीकत यह है कि इस योजना का जिले को कोई लाभ नहीं हुआ। 231 स्कूल ऐसे हैं जिन्हें सर्व शिक्षा अभियान के तहत अपग्रेड किया गया, लेकिन अभी तक इन स्कूलों की इमारतें नहीं बनीं।
इसकी वजह से बच्चों को किराए के मकानों में पढ़ना पड़ रहा है। कहीं एक कमरे में पांच कक्षाएं लग रही हैं तो कहीं एक कमरे में 100 से ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं।
वादे से मुकरा विभाग
शिक्षा विभाग स्कूलों को लेकर खास गंभीर नहीं। बुद्दल गांव के रहने वाले शोभा राम ने विभाग को स्कूल खोलने के लिए जमीन दी थी। तब शर्त थी कि उसके परिवार से किसी एक व्यक्ति को स्कूल में खाना पकाने की नौकरी दी जाए, स्कूल ने उसकी बहू को नौकरी पर रखा लिया, लेकिन एक साल तक जब वेतन नहीं मिला तो शोभा राम ने स्कूल बंद कर दिया। पिछले दो साल से स्कूल किराए के मकान में चल रहा है। ऐसा ही विवाद कालाकोट के खड़गाला गांव का है। यहां दो भाइयों की लड़ाई में स्कूल की इमारत छिन गई। बच्चे किराए के मकान में पढ़ रहे हैं।
उच्च अधिकारियों से मांगा है सहयोग
राजोरी के मुख्य शिक्षा अधिकारी मखन लाल शर्मा ने खुद इस बात को मानते हुए कहा कि फंड के अभाव में इन स्कूलों का निर्माण रुका हुआ है। अब जो स्कूल 2002 में बनना था, उसका मौजूद समय में खर्चा बढ़ गया है, लेकिन योजना के तहत उस पर दो लाख ही खर्च होने हैं। ऐसे में स्कूल का निर्माण कैसे हो। हमने उच्च अधिकारियों से बात की है। इसमें बोला गया है कि इन स्कूलों के निर्माण के लिए मौजूदा समय के हिसाब से फंड जारी किए जाएं। ताकि स्कूलों का निर्माण हो सके।
कहां फंसा है पेंच
वर्ष 2002 में सर्व शिक्षा अभियान योजना शुरू हुई थी। इसके तहत तीन कमरे बनाए जाने थे। शुरूआत में इसके लिए दो लाख रुपये का फंड निर्धारित किया गया था। इसके बाद 4.44 लाख, फिर 6 लाख और अब 7.45 लाख है। जैसे-जैसे स्कूलों का निर्माण शुरू होता गया खर्चा भी बढ़ता गया। केन्द्र की ओर से जारी खर्चे में स्कूल का निर्माण नहीं हो सका और ऐसे करते करते अब 231 स्कूल ऐसे हो गए हैं जो अधूरे निर्माण में फंसे हुए हैं। दरअसल, इसका एक कारण महंगाई भी माना जा सकता है। क्योंकि पिछले दस सालों में निर्माण सामग्री के दाम दुगने बढ़ गए हैं। अब जो स्कूल 2002 में शुरू हुआ, उसके लिए केन्द्र दो लाख रुपये ही देगा, जबकि उसका खर्च अब दोगुना हो चुका है।
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