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सुप्रीम कोर्ट का गिलानी को जवाब, कानून से ऊपर कोई नहीं |
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| इसलामाबाद। |
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| Story Update : Thursday, February 09, 2012 9:44 PM |
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी के खिलाफ अवमानना के मामले की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को कहा कि यदि प्रधानमंत्री राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले दोबारा खोलने के लिए स्विट्जरलैंड प्रशासन को पत्र लिखते हैं तो अवमानना का मामला अपने आप खत्म हो जाएगा। कोर्ट ने कहा कि इसके अलावा गिलानी के पास और कोई विकल्प नहीं है क्योंकि कानून से ऊपर कोई नहीं है।
अवमानना मामले के आरोप तय करने के लिए गिलानी को 13 फरवरी को पेश होने के खिलाफ की गई प्रधानमंत्री की याचिका की सुनवाई करते हुए आठ सदस्यीय जजों की बेंच के प्रमुख मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी ने कहा कि प्रधानमंत्री को पहल करनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि इस मामले को स्विट्जरलैंड के साथ उठाने के अपने आदेश के दो साल बाद तक कोर्ट ने धैर्य दिखाया। शीर्ष कोर्ट के गिलानी की 200 पेज की अपील याचिका पर जल्द ही फैसला दिए जाने की उम्मीद है क्योंकि बेंच ने गिलानी के वकील एतजाज अहसान को अपनी बहस शुक्रवार सुबह 10.30 खत्म करने का निर्देश दिया है।
चौधरी ने कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में शामिल व्यक्ति प्रधानमंत्री की पीपीपी पार्टी का प्रमुख है लेकिन कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है। बेंच ने कहा कि 60 मिलियन डॉलर रकम पाकिस्तान तभी वापस लाई जा सकती है जब प्रधानमंत्री स्विस प्रशासन पत्र लिखेंगे। स्विट्जरलैंड के अलावा भी सरकार को अन्य देशों को भ्रष्टाचार के मामले फिर से खोलने के लिए पहल करनी चाहिए।
चौधरी ने कहा कि प्रधानमंत्री को किसी भी संस्था को कमतर नहीं आंकना चाहिए। यह धन हमारी जेब में नहीं आएगा। वास्तव में देश इस धन को वापस चाहता है। उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि यदि प्रधानमंत्री पत्र लिखने से इंकार करते हैं तो उन्हें सभी न्यायाधीशों को बर्खास्त करके उनके स्थान पर अपनी पार्टी के पदाधिकारियों को बैठा देना चाहिए। उन्होने कहा कि हमें नही समझ में नहीं आ रहा है कि प्रधानमंत्री पत्र लिखने को लेकर इतना अड़ियल रुख क्यों अपना रहे है।
पूरी सुनवाई के दौरान अदालत ने गिलानी के वकील को जमकर फटकार लगाई। न्यायालय ने कहा कि गिलानी ने उनके खिलाफ आरोप पत्र दायर करने के उसके फैसले को चुनौती देकर भी अदालत की अवमानना की है। इफ्तिखार चौधरी ने कहा कि प्रधानमंत्री ने खुद अपनी फजीहत कराई है। उन्होंने कहा कि अपील में कुछ कानूनी बिंदु उठाकर उन्होंने न्यायालय को प्रभावित करने की कोशिश की।
न्यायमूर्ति साकिब निसार ने गिलानी के वकील अहसान से उनकी अपील से आपत्तिजनक पैराग्राफ को हटाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि वह अपनी अपील में यह बात कैसे लिख सकते हैं कि ऐसे प्रधानमंत्री के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही नहीं की जा सकती जिसने न्यायाधीशों की बहाली के लिए संघर्ष किया है। अहसान ने कहा कि उनके मुवक्किल को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए। अहसान ने कहा कि वह यह साबित कर देंगे कि प्रधानमंत्री की कार्रवाई कहीं से भी अवमानना नहीं है। उन्होंने कहा कि न्यायालय ने अपने आदेश ने सख्त भाषा का इस्तेमाल किया है ।
उल्लेखनीय है कि न्यायालय ने राष्ट्रीय सुलह अध्यादेश के तहत छूट प्राप्त जरदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले दोबारा खोलने के लिए स्विस प्रशासन को पत्र लिखने का आदेश दिया था। गिलानी के इस आदेश को लागू करने में नाकाम रहने के लिए अदालत ने दो फरवरी के आदेश में उनके खिलाफ अवमानना के आरोप पत्र दायर करने के वास्ते उन्हें समन जारी किया था । श्री गिलानी ने इस फैसले के खिलाफ अपील की है।
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