सत्तारूढ़ कंजरवेटिव पार्टी के कई सांसदों और अन्य के भारत को दी जा रही करोड़ों पाउंड की सहायता को खत्म करने की मांग के बीच ब्रिटेन ने सोमवार को अपने कदम का यह कहकर बचाव किया कि इसे खत्म करने का यह वक्त नहीं है।
आर्थिक संकट का सामना कर रही डेविड कैमरन की सरकार अंतरराष्ट्रीय मदद के तहत कुछ क्षेत्रों में भारत को सहायता दे रही है। हालांकि कैमरन सरकार को अपने इस फैसले के लिए देश में आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। ब्रिटिश सांसद और जनता भारत द्वारा अपने लड़ाकू विमान टाइफून को खारिज कर फ्रांस के राफेल को चुने जाने से भी खासे नाराज हैं।
भारत इसके बगैर भी विकास कर सकता है
भारत को सहायता समाप्त किए जाने की बहस को रविवार को उस समय और धार मिल गई जब यहां के दो समाचार पत्रों ने वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के पिछले साल अगस्त में दिए गए उस बयान को प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने कहा कि भारत जितना विकास मद में खर्च करता है, ब्रिटेन की सहायता उसमें पीनट्स के बराबर है और भारत इसके बगैर भी विकास कर सकता है।
प्रोग्राम की पिछले साल समीक्षा की थी
अंतरराष्ट्रीय विकास के लिए विभाग (डीएफआईडी) के प्रवक्ता ने सोमवार को बताया कि भारत को दी जारी सहायता पर विचार किए जाने की कोई योजना नहीं है। उन्होंने कहा कि हमने भारतीय सहायता प्रोग्राम की पिछले साल समीक्षा की थी। दोबारा से इसकी समीक्षा करने की कोई योजना नहीं है। कंजरवेटिव पार्टी के सांसद फिलिप डेविस, डगलस कार्सवेल और पीटर बोने ने सरकार की आलोचना करते हुए प्रधानमंत्री कैमरन से मुखर्जी के बयान को देखते तत्काल भारत को सहायता बंद करने की अपील की है लेकिन अंतरराष्ट्रीय विकास मंत्री एंड्रयू मिशेल ने भारत को दी जाने वाली सहायता का बचाव किया।
तीन गरीब राज्यों पर फोकस कर रहे
मिशेल ने कहा कि हम भारत में हमेशा के लिए नहीं रहेंगे लेकिन यह वक्त वहां से हटने का नहीं है। हमारा पूरा नया प्रोग्राम भारत और ब्रिटेन के राष्ट्रीय हित में है और यह दोनों देशों के बीच के व्यापक संबंधों का एक छोटा हिस्सा है। उन्होंने यह भी कहा कि हम भारत के प्रति अपने रुख में बदलाव कर रहे हैं। हम केवल भारत की केंद्रीय सरकार की तुलना में मात्र उसके तीन गरीब राज्यों पर फोकस कर रहे हैं। हम प्राइवेट सेक्टर में ज्यादा निवेश करेंगे।
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