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वक्त के साथ बदले लिखने के तरीके

Una

Updated Tue, 05 Jun 2012 12:00 PM IST
ऊना। वक्त बदलने के साथ-साथ लिखने के तरीके भी बदल गए हैं। आज के दौर में बच्चे कलम और दवात को भूल गए हैं। सेवानिवृत्त शिक्षक एवं अन्य शिक्षाविद भी मान रहे हैं कि तख्ती पर लिखना अपने आप में अलग कला है। इससे बच्चों की लिखाई में सुधार होता है। पुरातनकाल में संदेश लिखने के लिए पत्तों और एक विशेष किस्म की रोशनाई का इस्तेमाल किया जाता था। समय बदला और शिक्षण संस्थानों में कलम और तख्ती का दौर शुरू हुआ। तकरीबन वर्ष 1990 तथा इसके कुछ बाद तक शिक्षण संस्थानों में तख्ती, कलम और काली स्याही का इस्तेमाल आमतौर पर होता रहा। इससे बच्चों में लेख आदि लिखने का शौक पैदा होने के साथ उनक ी लिखाई भी सुधरती थी।
कलम से लिखने वाले छात्रों की लिखावट आज भी सबसे अलग नजर इसलिए आती है, क्योंकि तख्ती पर लिखना अपने आप में एक कला थी। फिर कागज पर पेन से लिखने का प्रचलन शुरू हुआ। वर्ष 2000 तक बाल पेन का दौर आया। 2000 के बाद जैल पेन बच्चों की पहली पसंद बने। 1957 में पांचवीं तक की पढ़ाई कर चुके मास्टर तरसेम लाल, शिव शंभू, यश पाल शारदा, हरिपाल शर्मा, हजारा सिंह, पवन शर्मा, तीर्थ राम, मास्टर मोहन लाल का कहना है कि जब वे स्कूल में पढ़ते थे, उस वक्त स्कूल में बिना तख्ती के जाने ही नहीं दिया जाता था। आज की युवा पीढ़ी की हैंड राइटिंग को देखकर तो यही कहा जा सकता है कि काश इन्होंने भी तख्ती पर कलम से लिखने का अभ्यास किया होता। आज एक ओर जहां स्कूलों में तालीम का नजरिया बदला है, वहीं आधुनिक छात्र और शिक्षक तख्ती और कलम को बेमानी समझने लगे हैं।
पैसे के फैलाव और आधुनिकता की चकाचौंध में अभिभावक और अध्यापक पूरी तरह से इस बात को भूल चुके हैं कि पढ़ने के साथ सुंदर लिखना भी अपने आप में एक कला है। लैपटॉप के जमाने में तख्ती और कलम की बात करना शायद बेमानी समझा जाता है। लेकिन यह हकीकत है कि मोरपंख से लिखी महर्षि वाल्मीकि की रामायण की सुंदर लिखावट कहीं देखने को नहीं मिलती। फिल्मों की पटकथा और गीत आदि भी आज लैपटाप पर ही लिखे जाने लगेेेे हैं।
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