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मशरूम सिटी सोलन में उत्पादकों की अनदेखी

Solan

Updated Thu, 01 Nov 2012 12:00 PM IST
सोलन। देश के खुंब शहर सोलन में खुंब का उत्पादन कई मर्तबा चुनावी हथकंडा बना। सरकारें बदलीं... परिस्थितियां बदलीं... पर मशरूम उत्पादन में व्यवस्था वहीं की वहीं रही। 1962 में सोलन से खुंब का पहला उत्पादन शुरू हुआ। सोलन शहर को मशरूम सिटी के नाम से देश और विदेश में पहचान मिली। अफसोस इतने प्रयासों के बावजूद खुंब शहर सोलन में आज भी खुंब बेगानी है।
उत्पादकों के लंबे संघर्ष के बाद भी मशरूम कृषि उत्पाद में शामिल नहीं हो सका है। नतीजतन सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल सका। महंगी बिजली, मंहगी कंपोस्ट खाद और महंगे यंत्रों के चलते उत्पादकों के लिए खुंब उत्पादन घाटे का सौदा साबित होने लगा है। मशरूम उत्पादकों के मुताबिक सोलन और आसपास के छोटे उत्पादकों ने विपरीत परिस्थितियों में अपने प्रयासों से देश में खुंब उत्पादन में सोलन को अग्रणी रखा है। लेकिन, उनकी समस्या को हर सरकार ने हाशिये पर रखा।
हालात ऐसे हैं कि मशरूम खेती का आकार अब सिकुड़ने लगा है। देश का पहला और सबसे बड़ा खुंब अनुसंधान केंद्र सोलन के चंबाघाट में ही है।

7000 टन उत्पादन, सैकड़ों उत्पादक
भारत में मशरूम की सर्वाधिक पैदावार सोलन जिले में होने का दावा किया जाता है। हिमाचल में करीब 7000 टन उत्पादन होता है। इसमें 90 फीसदी उत्पादन बटन मशरूम का है। कैंसर के इलाज के औषधीय गुण और शराब जैसी लत छुड़ाने वाली किस्में मशरूम की खेती में शामिल होने जा रही हैं।

चुनाव में मिले सिर्फ आश्वासन
खुंब उत्पादकों के मुताबिक 2001 में सोलन के चंबाघाट में खुंब विभाग के भवन के शुभारंभ के समय भाजपा के कई केंद्रीय आला नेता व राज्य नेता शामिल हुए। इन नेताओं ने खुंब उत्पादकों को आश्वासनों की घुट्टी पिला दी। कांग्रेस सरकार आई तो भी मांगें धरी की धरी रहीं। 2007 के चुनाव में भाजपा ने इसे घोषणा पत्र में शामिल किया, लेकिन आज तक मांग पूरी नहीं हो सकी है।

अनदेखी से नुकसान
खुंब उत्पादकों को बिजली दरों की छूट से महरूम रहना पड़ रहा है। रेट कामर्शियल के लग रहे हैं। करीब चार रुपये से अधिक प्रति यूनिट चार्ज हो रहा है। छह माह की पैदावार के लिए साल भर का खर्च उठाना पड़ रहा है। कृषि उत्पादों में रियायती दर से पचास पैसे की बिजली प्रति यूनिट मिल रही है।

कृषि उत्पादों को सेल्स टैक्स व अन्य टैक्स की दरों में छूट रहती है, लेकिन मशरूम उत्पादकों को टैक्स संबंधी किसी प्रकार की विशेष छूट नहीं दी जा रही। बिजली और कर की मार से मशरूम उत्पादक परेशान हैं।

यंत्र, कंपोस्ट खाद और कीटनाशकों में उत्पादकों को राहत न के बराबर है। बाजार के रेट पर उत्पादन से जुड़ी तमाम चीजें लेनी पड़ रही हैं। लिहाजा, बढ़ती महंगाई के साथ मशरूम उत्पादकों की परेशानियां अधिक बढ़ने लगी हैं। इसके लिए मांगें तो होती हैं पर अमल नहीं।

मशरूम उत्पादकों की मांगें दरकिनार
मशरूम उत्पादक एसोसिएशन आफ इंडिया के अध्यक्ष रत्न ठाकुर निवासी बेर की सेर चंबाघाट मशरूम की खेती से 1978 से जुड़े हुए हैं। उनका कहना है कि मशरूम उत्पादकों की मांगों को दरकिनार किया जा रहा है। मांगें जस की तस हैं। लंबे अरसे से उत्पादन को बढ़ावा नहीं मिल रहा है।

सोलन शहर के सन्नी साइड के मशरूम उत्पादक अमर जस्वाल 1980 से इसकी खेती से जुड़े हैं। वह एसोसिएशन के महासचिव भी हैं। इनके मुताबिक सरकारें आई और गईं, लेकिन मशरूम अपने शहर में बेगानी ही रही। कृषि उत्पाद में खुंब के शामिल न होने से घाटे का सौदा साबित होने लगा है।

अन्य मांगें भी अनसुनी
- कृषि उत्पादों की तरह समर्थन मूल्य नहीं
- एचपीएमसी का क्रय केंद्र खोलना
- हर जिले में विक्रय का स्थान मुहैया होना
- खुंब की खाद बनाने के चैंबर बढ़ाना
- कृषि बीमा योजना के तहत लाना
-गुणवत्ता प्रमाण पत्र अनिवार्य करना
- चंबाघाट में कृषि होस्ट का निर्माण


नहीं खोने दिया जाएगा गौरव: शांडिल
कांग्रेस प्रत्याशी धनीराम शांडिल का कहना है कि अगर उनकी सरकार बनी तो मांगों को प्राथमिकता से हल किया जाएगा। मशरूम से ही सोलन की पहचान है। इस गौरव को खोने नहीं दिया जाएगा।

सपना होगा साकार : कुमारी शीला
भाजपा प्रत्याशी कुमारी शीला ने कहा कि मशरूम ग्रोअर का सपना साकार होगा। सरकार बनी तो प्रमुखता से मांगों को उठाया जाएगा। जो नहीं हो सका, उसे संभव करके दिखाया जाएगा।
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