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सुकेत सत्याग्रह ने जगाई रियासतों के विलय की मशाल

Mandi

Updated Tue, 14 Aug 2012 12:00 PM IST

मंडी। देश को आजादी तो 15 अगस्त, 1947 को मिली। मगर कुछ रियासतों ने तत्काल भारतीय गणतंत्र में विलय नहीं किया। इन रियासतों के राजा स्वतंत्र रूप से अपनी हुकूमत चलाते रहे। 1948 में सुकेत सत्याग्रह के नाम से आंदोलन इन रियासतों के भारतीय गणतंत्र में विलय को लेकर किया था। इसकी अगुवाई स्वतंत्रता सेनानियों पं. पदम देव डा. वाईएस परमार आदि ने अपने हाथों में ले रखी थी।
सुकेत रियासत की प्राचीन राजधानी पांगणा से बगावत की यह मशाल जली थी। 8 फरवरी, 1948 को सुन्नी में प्रजामंडल के प्रतिनिधियों की बैठक हुई। इसमें तय किया कि रियासतों के विलय को लेकर सत्याग्रह चलाया जाए। सबसे पहले सुकेत रियासत को चुना गया। इस बारे 16 फरवरी को सुकेत के राजा लक्ष्मण सेन को सूचना दी गई कि वे 48 घंटे के अंदर राजसत्ता जनता को सौंप दे। इसी बीच पं. पदमदेव की अध्यक्षता में तत्तापानी में सत्याग्रहियों की एक बैठक हुई। जब सुकेत के राजा की ओर से कोई जवाब नहीं मिला तो करीब एक हजार लोगों का जत्था सुकेत रियासत पर कब्जा करने को निकला। इसमें आजाद हिंद फौज के पूर्व सिपाही भी शामिल थे। इस जत्थे ने सबसे पहले फेरनू चौकी पर कब्जा कर लिया। पुलिस रियासत की पुलिस ने सत्याग्रहियों के आगे हथियार डाल दिए। तिंरगा हाथ में लिए राष्ट्रीय गीत गाते हुए करसोग की ओर रवाना हुआ और काऊिपला बढ़ता गया। अब इस जत्थे में दो हजार लोग शामिल हो गए थे।
करसोग में जनता का राज स्थापित करने के बाद सत्याग्रहियों ने 19 फरवरी, 2012 को सुकेत की प्राचीन राजधानी पांगणा पर कब्जा कर लिया। सत्याग्रहियों ने 20 फरवरी को निहरी पर विजय प्राप्त कर ली। 23 फरवरी को जयदेवी पर कब्जा करने के बाद सत्याग्रहियों ने राज्य के तीन चौथाई हिस्से पर कब्जा कर लिया था। दूसरी ओर डैहर में भी विद्रोह हो गया। राजा ने घबरा कर भारत सरकार से मदद मांगी। सरकार के नेताओं ने साफ शब्दों में कहा कि भारत का अंग बने बिना भारत सरकार कोई हस्तक्षेप नहीं करेगी। आखिरकार सुकेत के राजा ने विलय के पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। सुकेत सत्याग्रह की सफलता के बाद अन्य रियासतों चंबा, सिरमौर और बिलासपुर के राजाओं पर भी विलय का दबाव पड़ने लगा। 15 अगस्त, 1948 तक इन सभी रियासतों का विलय भारतीय गणतंत्र में हो गया था।
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