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कुल्लू में अब तक अरबों हो चुके हैं राख

Kullu

Updated Sun, 25 Nov 2012 12:00 PM IST
कुल्लू। जिला की शान माने जाने वाले काष्ठकुणी शैली के मकानों का अस्तित्व मिटने की कगार पर है। सर्दी के मौसम में होने वाले अग्निकांडों के चलते अब तक सैकड़ों मकान आग की भेंट चढ़ चुके हैं। इसमें लोगों की अरबों रुपये की कमाई राख के ढेर में बदल चुकी है।
जिला की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि हर गांव में फायर ब्रिगेड पहुंचना मुमकिन नहीं। कई गांवों तो ऐसे भी हैं जहां अब तक सड़कें ही नहीं पहुंची हैं। काष्ठकुणी शैली के मकानों में अधिकतर लकड़ी का इस्तेमाल होता है। गांव में घर एक दूसरे से सटे होने तथा घर की निचली मंजिल में घास रखने की वजह से आग की एक चिंगारी पूरे घर को राख में बदलने को देरी नहीं लगाती।
एक घर में आग लगने के कारण पूरा का पूरा गांव जल उठता है। आग की घटनाओं के बाद अधिकतर लोग काष्ठकुणी शैली के मकान नहीं बनाते। लोगों की मांग है कि गांवों में ही छोटे-छोटे अग्निशमन यंत्र मुहैया करवाएं तो अग्निकांडों पर कुछ हद तक रोक लग सकती है। मणिकर्ण घाटी के मलाणा गांव में 2007 और 2009 में आग लगने से अरबों की संपत्ति राख हो गई थी। मणिकर्ण का शीला गांव भी एक बार राख के ढेर में बदल चुका है। यहां भी करोड़ों का नुकसान हुआ था। नवंबर 2007 में बंजार घाटी का मोहणी गांव आग की भेंट चढ़ गया था। सैंज में 2007 में काष्ठकुणी शैली में बना गर्गाचार्य का मंदिर, 2011 में रैला में काष्ठकुणी शैली के बने दो मंदिर और 2011 में कशु नारायण का मंदिर आग की भेंट चढ़ गया था। बंजार के जमद में 8 नवंबर को काष्ठकुणी शैली का मकान जलने से 35 लाख, पलाच में मकान जलने से 50 लाख का नुकसान और 22 नवंबर को मनाली के वशिष्ठ में मकान जलने से 50 लाख का नुकसान लोग उठा चुके हैं।

‘छोटे अग्निशमन यंत्र मुहैया करवाएं’
रैला के उपप्रधान बाल मुकुंद, पूर्व बीडीसी सदस्य राम कृष्ण कारदार, गिरधारी लाल भारद्वाज और कारदार भीमीराम ठाकुर आदि ने बताया कि अग्निकांडों में 95 फीसदी काष्ठकुणी शैली के मकान राख हो जाते हैं। इन मकानों में लोगों ने घास भी रखा होता है। ऐसे में एक छोटी सी चिंगारी भी भयंकर रूप धारण कर लेती है। प्रशासन को चाहिए की दुर्गम गांवों में छोटे-छोटे अग्निशमन यंत्र मुहैया करवाएं। अग्निकांडों के वक्त लोग इनका खुद इस्तेमाल कर नुकसान से बच सकते हैं।
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