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कैल, चील, देवदारां दे जित्थी चुलदे डालू...

Bilaspur

Updated Fri, 27 Jul 2012 12:00 PM IST
बिलासपुर। दिवंगत कलाकार एवं गायक संतराम चब्बा की चतुर्थ पुण्य तिथि के उपलक्ष्य में सर्किट हाउस में ‘एक शाम चब्बा साहब के नाम’ कार्यक्रम हुआ। प्रेस क्लब बिलासपुर के तत्वावधान में डा. नरेंद्र सांख्यान की अध्यक्षता में आयोजित बहुभाषी कवि एवं साहित्यिक गोष्ठी में कवियों ने अपनी रचनाआें के माध्यम से स्व. संतराम चब्बा को श्रद्धासुमन अर्पित किए। गोष्ठी का आगाज प्रेस क्लब के अध्यक्ष कुलदीप चंदेल ने स्व. संतराम चब्बा के व्यक्तित्व पर आधारित पत्र वाचन से किया। उन्होंने कहा कि स्व. चब्बा भले ही होमगार्ड के अधिकारी थे, लेकिन उनकी पहचान हमेशा एक कलाकार व गायक के रूप में बनी रही। जिस भी मंच से वह प्रस्तुति देते, दर्शक झूमने पर मजबूर हो जाते। दो दशक तक बिलासपुर के राम नाटक में प्रभु राम के किरदार के रूप में जीवंत अभिनय से उन्होंने दर्शकों पर अपनी प्रतिभा की अमिट छाप छोड़ी। उनके स्वरचित गीत आकाशवाणी शिमला से भी बजते रहे।
कवि रतन चंद निर्झर ने ‘अमरू पंडित’ शीर्षक से कविता प्रस्तुत की, जिसके बोल थे, ‘न जाने कितने घर टूटे-जुड़े होंगे, पंडित अमरू को इससे क्या सरोकार।’ प्रदीप गुप्ता की कविता की पंक्तियां थी, ‘चब्बा कलाकार कहलूर का, प्रदेश की माटी को महकाता था।’ स्व. संतराम चब्बा के छोटे बेटे कुलभूषण चब्बा ने अपने पिता का लिखा पहाड़ी गीत ‘कैल, चील, देवदारां दे जित्थी चुलदे डालू, लै बंसरी ऊची रिड़ियां गांदे ने ग्वालू’ सुनाया। कुलदीप चंदेल ने ‘से गल्लां किती रहियां’ शीर्षक से कविता सुनाई, जिसके बोल थे ‘आमलयां दा स्वाद होर स्याणयां दा जवाब बादे ते याद औंदा।’ सेवानिवृत्त डीपीआरओ आनंद सोहर ने पत्नी व प्रेयसी में अंतर दर्शाती हुई कविता सुनाई। दोनों के लिए इसके बोल थे, ‘तेरियां गल्लां लगदी ठंडे पाणिये री फल्लां-तेरी तत्ती तत्ती गल्लां लगदी पुबली दी फल्लां।’ इस पर खूब ठहाके गूंजे। विशाल ठाकुर ने ‘एक दिन मैं वीराने से गुजर रहा था’ कविता सुनाई। स्व. चब्बा के घनिष्ठ मित्र रहे सेवानिवृत्त बास्केटबाल कोच केआर गर्ग ने उनके साथ बिताए गए पलों को सांझा करते हुए कहा कि वह जिंदादिली की मिसाल थे। डा. नरेंद्र सांख्यान ने प्रेस क्लब के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि दिवंगत कलाकारों व साहित्यकारों को याद करने की यह एक अच्छी परंपरा है।
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