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विदेशी आक्रांताओं से मुक्ति का दिन है सात अक्तूबर

Rohtak

Updated Sun, 07 Oct 2012 12:00 PM IST
रेवाड़ी। अपनी तीक्षण बुदिध के बल पर एक व्यापारी से दिल्ली का बादशाह बनने वाले हेमू ने न केवल 22 युद्ध लड़कर अफगान विद्रोहियों व अकबर की सेना को खदेड़ा, अपितु सभी युद्धों में जीत हासिल की। उन्होंने शताब्दियों से विदेशी शासन की गुलामी में जकड़े भारत को विदेशी शासन से मुक्त कराने की पहल की और विक्रमादित्य वंश को फिर से स्थापित किया। उनके द्वारा जीता गया युद्ध, 1192 से लेकर 1947 तक किसी भी भारतीय द्वारा जीता गया एकमात्र युद्ध था। पृथ्वीराज चौहान की हार के बाद एकमात्र हेमू ही भारतीय जनमानस के लिए आशा की किरण बनकर उभरे और दिलों पर छा गए।
भारतीय मध्यकालीन इतिहास में पृथ्वीराज चौहान की 1192 में हुई हार के पश्चात भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीयता को गहरा आघात पहुंचा। मुगलों और विदेशी आक्रांताओं के सामने लड़ने की इच्छा शक्ति ही भारतीयों में समाप्त हो चुकी थी। ऐसे में रेवाड़ी के एक व्यापारी हेमचंद्र(हेमू) ने अपनी तीक्षण बुद्धि और शूरवीरता के बल पर न केवल सूर शासन में विभिन्न पदों पर रहे और प्रधानमंत्री व सेनानायक भी बने। 1545 में शेरशाह की मौत के बाद उनके पुत्र इस्लाम शाह ने उन्हें दिल्ली का आंतरिक सुरक्षाधिकारी व बाजार अधीक्षक बनाया और 1553 में उनकी कुशलता को देखते हुए इस्लामशाह के पुत्र आदिल शाह ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाकर अफगान विद्रोहियों से निपटने की जिम्मेदारी सौंपी। उन्होंने पंजाब से बंगाल तक विद्रोहियों के खिलाफ 22 युद्ध लड़े और सभी में विजय प्राप्त की।
पृथ्वीराज चौहान के बाद 350 सालों से त्रस्त भारतीय संस्कृति के उत्थान का बीड़ा हेमू ने उठाया। इस उत्थान का शिखर 5-6 अक्तूबर 1556 को दिखाई पड़ा, जब तुगलकाबाद के निकट दक्षिण हरियाणा व मेवात के योद्धाओं समेत हजारों योद्धाओं ने हेमू के साथ मुगलों को खदेड़ने का जोश दिखाया। ईरानी इतिहासकार फिरिश्ता के अनुसार- हेमू की फौज एक टिड्डी दल की तरह थी। उत्तर भारत में राष्ट्रीयता पूरे उबाल पर थी। भारतीयों के जोश के आगे बैरम खां के नेतृत्व अगबर की मुगल सेना टिक न सकी। सात अक्तूबर को दिल्ली के पुराने किले में उनका राज्याभिषेक किया गया। उन्होंने अफगान व राजपूत सेनानायकों के सामने अपने को विक्रमादित्य राजा घोषित किया। अबुल फजल के अनुसार लोगों के अपार समर्थन के बाद वह सेना में नई भर्ती करके काबुल विजय के लिए तैयार थे।
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