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नहीं रहा जैत्तों वाले मोर्चे का सिपाही

Karnal

Updated Mon, 03 Dec 2012 05:30 AM IST
जुंडला। आजादी की लड़ाई में अपनी अहम भूमिका अदा करने वाले प्यौंत में रहने वाले मक्खन सिंह पुत्र अर्जुन सिंह का रविवार को स्वर्गवास हो गया। प्रशासनिक अमले ने राजकीय सम्मान के साथ प्यौंत गांव में अंतिम संस्कार किया गया। उनकी सेवा कर रहे स्वर्ण सिंह ने उन्हें मुखाग्नि दी और आत्मिक शांति के लिए अरदास की। प्रशासन की ओर से एसडीएम गिरीश अरोड़ा, डीएसपी असंध श्यामलाल कौशिक, तहसीलदार राजाराम, एसआई सतबीर सिंह, कानूनगो मेवासिंह, नंबरदार जसबीर सिंह, सेवासिंह ने दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की।
स्वतंत्रता सेनानी मक्खन सिंह का जन्म पाकिस्तान के कोटरी बाघा जिला कुजरावालां में हुआ था। लेकिन आजादी केबाद वे गांव कांकड़ा जिला संगरूर पंजाब में रहने लगे। वर्ष 2004 में वे प्यौंत आ गए और यहीं पर अपने रिश्तेदार के यहां रहने लगे। वे 107 वर्ष के थे और क्षेत्र में चर्चा का विषय थे। इतनी उम्र होने के बावजूद मक्खनसिंह शारीरिक और मानसिक तौर पर स्वस्थ थे और सभी से प्रेमभाव से मिला करते थे। उनके परिजन स्वर्णसिंह ने बताया कि मक्खन सिंह जी अक्सर आजादी के समय की बातें बताया करते थे और युवाओं को देशप्रेम के लिए प्रेरित किया करते थे। उन्होंने अमृतसर में जलियावालां बाग में भी अंग्रेजों की गोलियां का सामना किया था और वे बच गए थे।

अंग्रेजों ने डाल दिया जेल में
18 सितंबर 1924 को अंग्रेजी हुकूमत की दमनकारी कार्यप्रणाली का विरोध करते हुए उन्होंने जैत्तो वाला मोर्चा में भाग लिया। लखासिंह जहान वालिया के नेतृत्व में चल रहे इस जत्थे को जैत्तो पहुंचने पर 17 जनवरी 1924 को गिरफ्तार कर लिया गया और बीड़ जेल नाभा में बंद कर दिया गया। बाद में गुरुद्वारा कानून बनने पर अगस्त 1924 में उन्हें रिहा कर दिया गया। उस समय मखनसिंह 17 वर्ष के थे। उन्होंने अपने अंतिम समय में प्यौंत गांव में रहकर लोगों को आजादी के समय के वो जुल्म भरे किस्से सुनाए हैं जो सदियों तक लोगों के जहन में रहेंगे। उनकी अंतिम यात्रा में पूर्व सरपंच गुरबाज सिंह संधु, साहब सिंह, हरजिंद्र सिंह ढिल्लो, पंच काबल सिंह, फौजी हरपाल सिंह, बाबा परमजीत सिंह, काका सिंह, जसबीर सिंह, रणबीर सिंह, प्रेमसिंह, अर्जुन सिंह सहित हजारों की संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे।

सुनाते थे अंग्रेजों की बर्बरता के किस्से
मक्खनसिंह के रिश्तेदार सरदार रणधीर सिंह ने बताया कि वे आजादी की लड़ाई के दौरान अंग्रेजाें द्वारा भारतीयों पर किए गए अत्याचारों के बारे में बताते थे तो उनकी आंखों से अश्रु धारा बह निकलती थी। लेकिन एक हौसला भी उनमें अजब था कि वे कभी अंग्रेजों के सामने झुके नहीं और देश के लिए काम करते रहे। भारत को अंग्रेजों से मुक्त करवाने में उस समय में हुए आंदोलनों में मक्खन सिंह ने पूरा सहयोग किया था।

कूट-कूट कर भरी थी देशभक्ति
स्वतंत्रता सेनानी मक्खन सिंह में देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर वे छोटे बच्चाें को मिठाई खिलाना कभी नहीं भूलते थे और उन्हें शहीद भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव के समान ही देश की सेवा करने के लिए प्रेरित किया करते थे। युवाओं को अक्सर कहते थे कि आजादी को संभाले रखना है तो नशे का खात्मा करो और पढ़ो-लिखो और कसरत करो।
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