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जानलेवा बीमारी ने एक और को घेरा

Karnal

Updated Fri, 02 Nov 2012 12:00 PM IST
कुरुक्षेत्र। शहर में जानलेवा बीमारी का एक और मामला सामने आने से स्वास्थ्य विभाग सहम गया है।
एलएनजेपी अस्पताल के डाक्टरों की टीम ने लैप्टो स्पाइरोसिस बीमारी से पीड़ित मरीज के घर जाकर जांच की और बीमारी न फैले उसके लिए जागरूक किया। गांव किरमिच निवासी सतीश कुमार 2 अक्तूबर से बुखार एवं गले की तकलीफ से पीड़ित था और उसने कई निजी चिकित्सकों से उपचार करवाया, लेकिन उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। बीमारी शुरू होने के 20 दिन बाद उसे उपचार के लिए मोहाली के एक अस्पताल भेज दिया, जहां बीमारी की पुष्टि की गई और उसका उपचार किया। इसकी रोकथाम के लिए क्यूबा और चीन जैसे देशों में मनुष्य एवं पशुओं के लिए वैक्सीन उपलब्ध है। हालांकि इस बीमारी के उपचार की दवा कुरुक्षेत्र के सभी सरकारी अस्पतालों में भी उपलब्ध है।

पिहोवा के गांव में आया था पहला मामला
पिहोवा के गांव सयाणा सैयदां में लैप्टो स्पाइरोसिस बीमारी का पहला मरीज पाया गया था, जिसके बाद मरीज की मृत्यु हो गई थी। बीमारी की पुष्टि होते ही स्वास्थ्य विभाग की टीम ने गांव का दौरा भी किया था, लेकिन अब कुरुक्षेत्र में दूसरा मरीज मिलने से महकमे में हड़कंप मच गया है।

रैपिड रिस्पांस टीम का गठन
लैप्टो स्पाइरोसिस सहित कई बीमारियों की जांच एवं उपचार के लिए राज्य सरकार द्वारा हर जिला मुख्यालय स्तर पर एक रैपिड रिस्पांस टीम का गठन किया गया है, जिसमें फिजिशियन, पैथोलॉजिस्ट, महामारी विशेषज्ञ के अलावा संबंधित क्षेत्र के चिकित्सा अधिकारी, बहु उद्देश्य कर्मचारी शामिल हैं। कुरुक्षेत्र की सिविल सर्जन डा. वंदना भाटिया के निर्देश पर हृदय एवं छाती रोग विशेषज्ञ डा. शैलेंद्र ममगाईं शैली, बहु उद्देश्य स्वास्थ्य निरीक्षक सुरेश मित्तल की टीम ने किरमिच गांव का दौरा किया और रोगी सहित उसके परिवार के सदस्यों और गांव के लोगों को इस बीमारी के बारे में पूरी जानकारी दी।

ऐसे होती है ये बीमारी
लैप्टो स्पाइरोसिस विश्व की उन चुनिंदा बीमारियों में से एक है, जो पशुओं से मनुष्य को चपेट में ले लेती है। संक्रमित पशु के यूरिन के पानी के संपर्क में आने पर मनुष्य के शरीर में किसी घाव से लैप्टो स्पाइरा नामक बैक्टीरिया मनुष्य के शरीर में प्रवेश करता है। बिल्ली, चूहे, कुत्ते, हिरण, खरगोश, गाय, भेड़ सहित कई जानवरों से यह बीमारी फैलती है। इस बीमारी के ज्यादातर मामले पतझड़ के मौसम में देखे जाते हैं। संक्रमित पशुओं के वीर्य से भी यह बीमारी फैल सकती है। इसके अलावा संक्रमित पानी, भोजन एवं मिट्टी से ये बीमारी मनुष्य तक पहुंच सकती है। मनुष्य से मनुष्य को यह बीमारी नहीं फैलती। इस बीमारी को कई नामों से जाना जाता है, जिनमें वील्स सिंड्रोम, केनीकोला फीवर, केनफील्ड फीवर, नानू कयामी फीवर, सात दिवसीय बुखार, काला पीलिया, रेट कैचर्स, यैलो एवं फोर्ट ब्रेग्स फीवर मुख्य है।

बीमारी से ये रहें सावधान
डा. शैली ने बताया कि यह बीमारी ज्यादातर उन लोगों को होती है, जो पशुओं के व्यवसाय, मांस काटने के व्यवसाय, मछली पालन, अनाज की कटाई, तैराकी, सीवरेज एवं मलमूत्र के सफाई अभियान से जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि लैप्टो स्पाइरोसिस से पीड़ित व्यक्ति के रक्त एवं दिमाग में मौजूद सैरीब्रो स्पाइनल फ्ल्यूड में पहले 7 से 10 दिन के भीतर इस बीमारी के बैक्टीरिया मिलने की संभावना रहती है। बीमारी से पीड़ित व्यक्ति के यूरिन में 10 दिन बाद ये बैक्टीरिया दिख सकता है।

लैप्टो स्पाइरोसिस के लक्षण
एलएनजेपी अस्पताल के हृदय एवं छाती रोग विशेषज्ञ डा. शैलेंद्र शैली ने बताया कि इस बीमारी के पहले चरण में रोगी को बुखार, मांसपेशियों में दर्द, दांत किड़किड़ाना एवं तेज सिरदर्द होता है। पहले चरण के कुछ दिनों बाद दूसरे चरण में रोगी दिमागी बुखार, पीलिया एवं गुरदों के फेल होने की स्थिति में पहुंच जाता है। इस बीमारी की जानकारी के अभाव में रोगी की इस बीमारी का कई बार पता ही नहीं चल पाता। दूसरे चरण में रोगी के शरीर में तेज बुखार, तेज सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द, पीलिया, लाल आंखें, पेटदर्द, दस्त एवं शरीर में दाने आदि लक्षण होते हैं। ज्यादा गंभीर रोगियों में दिमागी बुखार, स्वर्ण शक्ति में कमी और सांस की बीमारी के लक्षण प्रकट होते हैं। कभी-कभी यह हृदय को भी चपेट में ले लेती है। यह बीमारी बैक्टीरिया के शरीर में प्रवेश करने के 2 से 20 दिन के अंदर कई लक्षणों को उजागर करती है। बीमारी के दूसरे चरण में रोगी के रक्त में प्लेटलेट्स की कमी से शरीर के किसी भी हिस्से से खून बहना शुरू हो सकता है। इससे व्यक्ति की मौत हो सकती है।

बीमारी से ऐसे बचें
इस बीमारी की पुष्टि एलाइजा एवं पीसीआर, मैट जैसी जांचों से की जा सकती है। बीमारी के लक्षणों के चलते कई बार चिकित्सक ऐसे रोगियों को डेंगू बुखार पीलिया, दिमागी बुखार, मलेरिया एवं टायफाइड मानकर रोगी का उपचार करते हैं, इसलिए इस बीमारी के बारे में चिकित्सकों को ध्यान में रखना चाहिए।
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