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डा. कामराज संधू देंगे ईसी चुनाव को चुनौती

Karnal

Updated Sun, 30 Sep 2012 12:00 PM IST
कुरुक्षेत्र। एसएफएस के तहत कार्यरत शिक्षकों की अनदेखी ने आखिरकार केयू एग्जीक्यूटिव काउंसिल के चुनाव को नए बखेडे़ में डाल दिया है। बड़ी मुश्किल से जो अधिकार 14 साल बाद मिले थे, उस पर स्टे का खतरा मंडराने लगा है। इस चुनाव के खिलाफ सेल्फ फाइनेंस स्कीम के तहत कार्यरत 75 शिक्षकों में जबरदस्त रोष है। कुुरक्षेत्र विश्वविद्यालय की अहम बाडी एग्जीक्यूटिव काउंसिल में अब यूसीके, दूरवर्ती शिक्षा निदेशालय, यूनिवर्सिटी बीएड कालेज और संस्कृत एवं प्राच्य विभाग के शिक्षकों में से एक नुमाइंदा प्रतिनिधित्व कर सकेगा। ईसी के इस एक सदस्य का चुनाव उपरोक्त चारों संस्थानों के शिक्षक मतदान से करेंगे। चुनाव लड़ने और मतदान की इस प्रक्रिया से सेल्फ फाइनेंस के तहत कार्यरत केयू के शिक्षकों को वंचित रखा गया गया है। हालांकि अभी तक ये विरोध दबा हुआ था, लेकिन केयू के इस रवैये के खिलाफ चिंगारी भड़क चुकी है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के पूर्व उपाध्यक्ष डा. कामराज संधू ने केयू पर दोहरे मापदंड का आरोप लगाया है। उन्होंने बताया कि वे सेल्फ फाइनेंस स्कीम के तहत कार्यरत शिक्षकों को उनका हक दिलाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ेंगे और इसका विरोध धरना देकर भी होगा। बुधवार को इसके विरोध में केयू कुलपति डा. डीडीएस संधू के कार्यालय के बाहर धरना प्रदर्शन करने की रणनीति बनाई जा रही है। संधू के मुताबिक यूनिवर्सिटी प्रशासन ने एसएफएस के 75 शिक्षकों को चुनाव लड़ने और मतदान से वंचित रखने का गलत कदम उठाया है, जिसे वापस लेना होगा। संधू ने इसके साथ वर्तमान कुटा अध्यक्ष डा. प्रदीप चौहान पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि डा. चौहान एक साथ तीन पदों पर नहीं रह सकते। अगर उन्हें चुनाव लड़ना है तो वे सबसे पहले कुटा और एचफुक्टो के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देना होगा। डा. चौहान ने स्वार्थ वशीभूत होकर एसएफएस की लड़ाई लड़ने के बजाय उल्टा खुद ही चुनाव में हिस्सा ले लिया, जबकि उन्हें चाहिए था कि वे शिक्षक नेता होने के लिहाज से सबसे पहले एसएफएस के शिक्षकों के हक की लड़ाई लड़ते।
ईसी की बैठक के दौरान वर्ष 2005 का निर्णय
केयू के शिक्षक नेता डा. कामराज संधू के मुताबिक 25 सितंबर 2005 को केयू में ईसी की बैठक के दौरान जो निर्णय लिया गया था, उसमें स्पष्ट है कि केयू में सेल्फ फाइनेंस स्कीम के तहत कार्यरत शिक्षकों को पेंशन छोड़कर वे सभी सुविधाएं मिलेंगी, जोकि अन्य शिक्षकों दी जा रही हैं।

आपत्ति करा चुके हैं दर्ज, लेकिन नतीजा जीरो
संधू के मुताबिक जब ईसी के चुनाव में दूसरे शिक्षकों को चुनाव लड़ने और वोटिंग का अधिकार प्राप्त है, तो इस निर्णय के खिलाफ जाकर एसएफएस के शिक्षकों को दरकिनार क्यों किया गया? इसकी शिकायत वे लिखित में केयू कुलपति को कर चुके हैं। इस शिकायत में 2005 के निर्णय का हवाला दिया गया है। कुछ दिन पहले एक लिस्ट जारी हुई थी। इस लिस्ट में ईसी चुनाव, नामांकन भरने और नाम वापस लेने की जानकारी दी गई थी, साथ ही लिस्ट में केयू के उन चार शिक्षण संस्थानों के नामों के साथ इनमें कार्यरत उन शिक्षकों के नाम भी थे। इसके साथ इस लिस्ट में नाम नहीं होने और किसी प्रकार की आपत्ति दर्ज कराने की बात कही गई थी। उन्होंने इस संदर्भ में वीसी और कुटा अध्यक्ष को लिखित में शिकायत की थी, लेकिन नतीजा जीरो निकला।

कुटा सचिव ने कहा, गलत है निर्णय
कुटा के सचिव डा. परमेश ने कहा कि ईसी के चुनाव में सेल्फ फाइनेंस स्कीम के तहत कार्यरत शिक्षकों को नजरंदाज करना गलत है। उन्हें भी इस चुनाव में शामिल किया जा सकता था।

ईसी में पुरजोर तरीके से उठाया जाएगा मुद्दा
कुटा प्रधान प्रदीप चौहान ने कहा कि सेल्फ फाइनेंस का मुद्दा वह बिल्कुल जायज है और उन्हें भी चुनाव में खड़े होने का अधिकार मिलना चाहिए। मैं इस चुनाव में जीतने के बाद उन्हीं के लिए संघर्ष करूंगा और ईसी में पुरजोर तरीके से इस बात को उठाया जाएगा। उन्होंने दूसरे पद पर नामांकन भरने के बारे में कहा कि यह कोई पद नहीं संघर्ष का रास्ता है। लोगों के वोट देने के कारण ही वे पहले भी चुनाव जीत चुके हैं।

यह है मामला
एग्जीक्यूटिव काउंसिल यूनिवर्सिटी के फैसलों में अपनी अहम भूमिका निभाती है और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में इसके लिए चुनाव का अधिकार 14 साल बाद मिला है। इसके लिए जहां नामांकन वापस लेने की अंतिम तिथि 28 सितंबर निर्धारित की गई थी, वहीं चुनाव के लिए 5 अक्तूबर को मतदान होगा। मैदान में तीन उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला होना है, जिसके लिए 73 टीचर मतदान करेंगे और इस बार मैदान में तीन उम्मीदवार हैं। सेल्फ फाइनेंस स्कीम के तहत कार्यरत अध्यापकों को इसमें वोट डालने का अधिकार नहीं है।
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