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शोवना की कत्थक प्रस्तुति ने मन मोहा

Hisar

Updated Thu, 01 Nov 2012 12:00 PM IST
हिसार। मृदंग की थाप, वीणा की लय, और गुंजन के मध्य हुई पदमश्री शोवना नारायण के कत्थक ने प्राणनाथ प्रणामी यूनिवर्सिटी के प्रत्येक विद्यार्थी और अध्यापकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसी कार्यक्रम में पीपीयू में स्पिक मैक हिसार चैप्टर की शुरुआत भी हुई। सरस्वती वंदना के बाद विष्णु वंदना के माध्यम से शोवना नारायण ने अपने कत्थक नृत्य की शुरुआत की। नृत्य के बाद उन्होंने कत्थक नृत्य की बारीकियां बताईं।
उन्होंने भगवान कृष्ण की बांसुरी, मां सरस्वती की वीणा, शिवजी के डमरू और तांडव नृत्य के को कत्थक के माध्यम से बताया। कार्यक्रम के दौरान उन्होंने विभिन्न हस्त कलाओं जैसे चिड़िया, सांप, मोर, हिरण, हाथी, शेर आदि विभिन्न मुद्राओं के माध्यम से बताया। इसके बाद उन्होंने भगवान कृष्ण द्वारा कालिया नाग मर्दन, द्रोपदी चीरहरण और तांडव नृत्य को पेश किया। कार्यक्रम का अंत उन्होंने घुंघरूओं की विभिन्न आवाजों के साथ किया। पीपीयू के डायरेक्टर जनरल नितिन कथूरिया ने पदमश्री शोवना नारायण को सम्मानित किया। कार्यक्रम में कार्यकारी निदेशक रविंद्र सैनी, पीपीआईएमटी के प्रिंसिपल राजेश बंसल, पीपीआईएफटी के प्रिंसिपल राजेश वास्तव, पंकज मक्कड़ और स्टाफ सदस्य मौजूद रहे।

पी-1 हिसार के पीपीयू में कत्थक नृत्यांगना अपनी प्रस्तुति देती हुई।



ढाई साल की उम्र से शुरू किया कत्थक सीखना: शोवना
पदमश्री अवार्डी नृत्यांगना बोली कत्थक सीखने वालों की संख्या बढ़ी

हिसार। कत्थक ही मेरी जिन्दगी है। मेरी इच्छा है कि वह इस विधा को और आगे बढ़ाए। यह सब तब हो पाएगा जब प्रत्येक माता-पिता अपनी संतान को बचपन से अच्छे संस्कारों के साथ-साथ भारतीय संस्कृति से अवगत करवाएं। यह कहना है पदमश्री अवार्डी नृत्यांगना शोवना नारायणन का। वे बुधवार को प्राणनाथ प्रमामी यूनिवर्स (पीपीयू) के परिसर में पत्रकारों से बातचीत कर रहीं थीं। इस दौरान उन्होंने अपनी जीवन के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत की। कत्थक नृत्य की शुरुआत के बारे में उन्होंने कहा कि जब वह अढ़ाई वर्ष की थी, तब गुरु साधना बोस ने उनका हाथ पकड़ कर ताल पकड़ना सिखाया था। उसके बाद तो उन्होंने गुरु कुंदनलाल और बिरजु महाराज के सांनिध्य में कथक की बारीकियों को सिखा था। संगीत में हो रहे बदलाव के बारे में उन्होंने कहा कि कत्थक भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। यह प्रत्येक भारतीय के दिल में बसा है। इसलिए हमें यह नहीं मानना चाहिए कि कत्थक और दूसरे शास्त्रीय नृत्यों को चाहने वालों की संख्या में कमी आएगी।
उन्होंने कहा कि पहले की तुलना में अब अधिक बच्चे कत्थक सीख रहे हैं। जिस प्रकार गर्मी के बाद ठंडी हवा का झोंका तन और मन को सुकून देता है उसी प्रकार कत्थक भी जनमानस को नई ऊर्जा देगा।
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