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रावण के किरदार को जीते हैं बनवारी

Gurgaon

Updated Wed, 17 Oct 2012 12:00 PM IST
गुड़गांव। बनवारी लाल सैनी के लिए रावण की भूमिका सिर्फ उनका शौक नहीं पैशन बन चुका है। वैसे तो वह श्रीराम के अनन्य भक्त हैं, लेकिन रामलीला के दस दिनों तक राम का नाम नहीं लेते। अगर कोई उनसे राम-राम का अभिवादन भी करता है तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ जाता है। बनवारी लाल कहते हैं कि रावण की भूमिका से उनका गहरा लगाव है। वह अपने किसी किरदार को रीयल लाइफ में भी जीते हैं। वह आम दिनों में रोजाना रामचरितमानस पाठ करते हैं। इसके बिना अन्न-जल भी ग्रहण नहीं करते। रात में जब भी उनकी नींद खुलती है तो वह रामचरित मानस ही पढ़ते हैं। पर रामलीला के दिनों में वह इसका पाठ करना तो दूर, इसे देखना भी पसंद नहीं करते।
जितने दिन तक बनवारी लाल सैनी रावण की भूमिका निभाते हैं, वह जमीन पर चटाई बिछाकर सोते हैं। बिस्तर का पूरी तरह से त्याग कर एक सात्विक जीवन जीते हैं। सैनी बताते हैं कि रामलीला मंचन के दौरान उन्हें उस समय काफी क्रोध आता है जब हनुमान बंदी बनने के बाद मेघनाद से यह कहते हैं कि ‘मुझे मौका मिला जाने को दरबार में, देखूं कितनी धार है तेरे बाप की तलवार में’। अपने किरदार में डूबने का ही नतीजा है कि रावण की दमदार भूमिका के लिए उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड में दर्ज हुआ है। बनवारी लाल वर्ष 1977 से रामलीला से जुड़े हुए हैं। श्री दुर्गा रामलीला कमेटी की ओर से जैकमपुरा में आयोजित होने वाली रामलीला में 1977 से 1979 तक मेघनाद की भूमिका निभाई। लेकिन वर्ष 1980 से अब तक लगातार वह रावण भी भूमिका निभा रहे हैं। उनका कहना है कि वह रावण की बुराई नहीं, उनकी विद्वता से प्रभावित हैं।
बनवारी के रावण बनने के पीछे की कहानी
बनवारी लाल सैनी रावण कैसे बने, इसके पीछे भी एक कहानी है। बात वर्ष 1980 की है जब श्री दुर्गा रामलीला कमेटी मंचित रामलीला में रावण की भूमिका निभाने वाला कलाकार नहीं आया। उस समय के रामलीला डायरेक्टर भजन लाल परमार और यादराम सौदा के माथे पर चिंता की लकीरें पड़ने लगीं। तब दोनों से सैनी से कहा कि क्या वह रावण बनेंगे? सैनी बताते हैं कि उन्होंने तुरंत हां कह दिया। तबसे लेकर आज तक वह रावण की भूमिका निभा रहे हैं और जनता भी रावण के रूप में किसी और को देखना भी नहीं चाहती है।
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