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स्लम सिटी का कलंक मिटाएगा ‘रे’

Faridabad

Updated Tue, 09 Oct 2012 12:00 PM IST
फरीदाबाद। जनसंख्या के हिसाब से देश का दूसरा बड़ा स्लम माने जाने वाले औद्योगिक शहर के माथे से अब स्लम सिटी का कलंक मिटाने के लिए नगर निगम ने ब्लूूप्रिंट तैयार करने की कवायद शुरू कर दी है। निगम को राजीव आवास योजना (रे) के तहत केंद्र सरकार से ग्रांट मिलने वाला है। इस ग्रांट राशि को पाने के लिए शहर का जीआईएस (जियोग्राफिकल इंफार्मेशन सिस्टम), बायोमीट्रिक, सामाजिक-आर्थिक सर्वे और डीपीआर(डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) बनाया जाएगा, जिसका काम दिल्ली की एजेंसी गहेली सेंटर ऑफ रिसर्च एंड डेवलपमेंट को सौंपा गया है। एजेंसी द्वारा यह सर्वे चार माह में पूरा कर लिया जाएगा और फिर इसके आधार पर शहर को स्लम फ्री बनाने के लिए राशि आवंटित की जाएगी। निगम प्रशासन बदले मे एजेंसी को 99 लाख 89 हजार 563 रुपये देगा। इस सर्वे से ही पता चलेगा कि इस समय शहर में कितने स्लम परिवार हैं। कि स स्लम के लोगों को दूसरी जगह शिफ्ट किया जा सकता है और किस स्थान पर मल्टी स्टोरी बिल्डिंग बनाकर उनके लिए आशियाना बनाया जा सकता है।
जीआईएस सर्वे का फायदा:
जियोग्राफिकल इंफार्मेशन सिस्टम के सर्वे में सैटेलाइट के माध्यम से स्लम की हर यूनिट (घर, झुग्गी, दुकान ) की मैपिंग कर भौगोलिक निर्देशांक लिए जाते हैं। यह निर्देशांक स्थायी होते हैं, इसलिए सर्वे में लिखा जाएगा कि किस निर्देशांक पर किसका घर, दुकान या झुग्गी है। इस तरह सर्वे में पारदर्शिता बनी रहेगी। जीआईएस सिस्टम में उस निर्देशांक को डालने पर वही यूनिट दिखेगी, जो उस बिंदु पर स्थित है। इसमें जीपीएस(ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) एवं टोटल स्टेशन नामक मशीनों की मदद ली जाएगी।

बायोमीट्रिक सर्वे का फायदा:
-इसमें हर स्लम परिवार के सभी सदस्यों की ग्रुप फोटो, सबके फ्रिंगर प्रिंट, आंखों की पुतली का स्कैन लिया जाएगा। ताकि बाद में गोलमाल न हो पाए।

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सामाजिक-आर्थिक सर्वे:
-यह देखेंगे कि किस परिवार की सामाजिक-आर्थिक हैसियत क्या है। कौन-कौन लोग कहां काम करते हैं, कहां-कहां पर पढ़ाई करते हैं आदि।
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बोगस थी वेपकोस की रिपोर्ट:
-स्लम के परिवारों के संबंध में हरियाणा सरकार पहले ही वेपकोस नामक एजेंसी से सर्वे करवा चुकी है। नगर निगम के चीफ टाउन प्लॉनर एससी कुश का कहना है कि यह सर्वे बोगस था। क्योंकि इस एजेंसी की रिपोर्ट पर जब नगर निगम की इंजीनियरिंग शाखा ने उसका वेरीफिकेशन किया तो बहुत गलतियां निकलीं। जो नक्शा दिखाया गया था वह मौके पर नहीं मिला। इस तरह का फर्जीवाड़ा न हो इसलिए इस बार जीआईएस एवं बायोमीट्रिक आधारित सर्वे होगा।
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-एक पुराने सर्वे के मुताबिक शहर में 64 कलस्टर में करीब 47,525 हजार स्लम परिवार हैं, जिनके पुनर्वास के लिए एक हजार करोड़ रुपये से अधिक लगने का अनुमान है।
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-जिले की कुल 312 एकड़ जमीन पर स्लम का कब्जा है, जिसमें से 124 एकड़ नगर निगम की है। (निगमायुक्त)।

रोजगार मिला, आशियाना नहीं इसलिए बना स्लम:

आजादी के बाद यह शहर पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के विस्थापन का बड़ा केंद्र था। यहां बाटा, एस्कॉर्ट्स जैसी कंपनियों के सहारे औद्योगीकरण की नींव पड़ी। 70-80 के दशक में यहां कपड़ा मिलें, ऑटोमोबाइल कंपनियां आईं और यह एक बड़ा औद्योगिक शहर बनकर उभरा। इसलिए यहां बड़ी संख्या में यूपी, बिहार, बंगाल से लोग रोजगार की तलाश में आए। रोजगार तो मिल गया लेकिन रहने को आशियाना नहीं मिला तो मजदूरों ने झुग्गियां बनानी शुरू कीं। श्रमिक नेता बेचू गिरी कहते हैं सरकार ने मजदूरों के लिए एक भी सेक्टर नहीं काटा। इस वजह से कुछ लोगों ने (अच्छे वेतन वाले) जमीन लेकर मकान बनाया और कुछ लोग (बहुत कम वेतन वाले) झुग्गी-झोपड़ी में रहने लगे। इस वजह से यह शहर स्लम में बदल गया।
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