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आग से महफूज नहीं ट्विनसिटी के बाजार

Ambala

Updated Fri, 28 Dec 2012 05:30 AM IST
अंबाला। छावनी के हलवाई बाजार में मोहन शू कंपनी में लगी आग ने शहर औैर छावनी के उन तमाम बाजारों की आग से सुरक्षा पर सवाल खड़ा का दिया है, जो बाजार बेहद तंग गलियों में हैं। इन बाजारों का तंग गलियों में होना एक बात है, मगर इन दुकानों के ऊपर जो कई महिला तक गोदाम व शोरूम बनते जा रहे हैं, उनकी सुरक्षा कैसे हो सकती है, ये एक बड़ा सवाल है।
उधर, देखा जाए तो इन कारोबारियों पर बिना अनुमति ही गोदाम खोलने पर भी प्रशासन का कोई शिकंजा नहीं है, जबकि इन बाजारों में यदि आग लगी, तो इस आग को एकदम काबू कर पाना भी फायर ब्रिगेड के बस में नहीं है। क्योंकि फायर ब्रिगेड के पास भी ऐसे उपकरण नहीं हैं, जिससे वे इन तंग गलियों की आग पर समय रहते काबू पा सकें। खुद फायर ब्रिगेड के अफसर ये मानते हैं कि बाजारों की तंगी ऐसे मामलों में बहुत ज्यादा मुश्किल पैदा कर सकती है।

ये हैं शहर के तंग बाजार
1. हलवाई बाजार करीबन आठ फुट चौड़ी एक गली में ये बाजार बसा हुआ है। शहर का ये सबसे पुराना बाजार है। कई हलवाई की दुकानें इस बाजार में हैं और अच्छी खासी भीड़ इस बाजार में लगी रहती है। अंदर ही अंदर ये गहरा बाजार है। बाजारों में हर दुकान के ऊपर या तो रिहायश है, या गोदाम इत्यादि। यदि आगजनी हुई, तो कैसे बचना होगा बहुत मुश्किल? कारोबारियों ने अग्निशमक यंत्र भी नहीं लगा रखे हैं।

2. मीना बाजार- शहर का ये मीना बाजार भी बेहद पुराना बाजार है। इसकी चौड़ाई भी करीबन आठ फुट है। गारमेंट, सुनार, ज्वेलर्स, कन्फेक्शनरी की हर तक की काफी संख्या में दुकाने हैं, मगर दुकानों के ऊपर गोदाम व रिहायश स्थित है। गलियों के अंदर से गलियां घुस रही है और अंदर ही अंदर गोदाम बनते जा रहे हैं। आग से बचाव का कोई इंतजाम नहीं। आग लगी, तो हालात हो सकते हैं बहुत खराब

3 .जैन बाजार- शहर का जैन बाजार भी पुराने बाजारों में से एक है। अधिकतर दुकानें गारमेंट की। एक गली से दूसरी गली और दूसरी से तीन गली। बस, इसी तहर ये करीबन पांच से आठ फीट की गलियों में ही ये लंबा-चौड़ा बाजार बसा है। ऊपरी मंजिलों पर कपडे़ के गोदाम है। मगर अग्निशमक यंत्र किसी के पास नहीं। यदि आग लगी, तो हालात बहुत भयंकर हो सकते हैं।

4 पिपली बाजार- शहर का पुराने बाजारों में से एक है पिपली बाजार। कास्मैटिक और ज्वैलर्स की ज्यादा दुकानें। नीचे दुकान, ऊपर गोदाम। हालात ऐसे की दो वाहन अंदर घुस जाए, तो जाम लग जाए। ऊपर से दुकानदारों के अपने वाहन भी खड़े हैं। कई बाजार पांच फीट का तो कहीं सात फीट का। किसी के पास भी अग्निशमक यंत्र नहीं। यदि आग लगी, तो संभालना मुश्किल।

5 छोटा बाजार-जैसा नाम, वैसा ही इलाका। दुकानों की संख्या तो बेशुमार, मगर इस पुराने बाजार में से कोई वाहन पर आसानी से गुजरकर दिखाए। गलियों ही गलियों में बसा ये बाजार, तंगहाली खुद ही बयां करता है। नीचे विभिन्न कारोबार की दुकानें, ऊपर रिहायश या गोदाम। अग्निशमक यंत्रों को लेकर कोई कारोबारी सजग नहीं। बाजार में आग लगी, तो सब कुछ राम भरोसे है।

6. जट्टा वालां बाजार- शहर का एक और पुराना बाजार। इसे जट्टा वाला बाजार को तस्वीरों वाली गली के नाम से भी ज्यादा जाना जाता है। तस्वीर बनाने वालों की संख्या बहुत ज्यादा। जबकि अन्य कारोबारी भी मौजूद है, मगर चौड़ाई लगभग छह से सात फीट। पैदल गुजरना भी मुश्किल। व्यवसायिक प्रतिष्ठानों में अग्निशमक यंत्रों का होने का सवाल कहां? आग लगी, तो भारी नुकसान की आशंका।

7. शहर के शुकलकुंड रोड, बस स्टैंड मार्केट, लक्ष्मी बाजार व कपड़ा मार्केट के अधिकांश छोटे बाजार ऐसे है, जो बेहद तंग गलियों में ये बाजार तीन फीट से लेकर छह फीट की गलियों में बसे हैं। तमाम दुकान कपड़ों, कॉस्मेटिक व गिफ्ट शॉप की। तीन से चार फीट चौड़ी गलियों में बसे कई बाजार तो ऐसे, जहां दिन में भी अंधेरा, लाइटों का लेना पड़ता है सहारा। जबरदस्त बड़े-बड़े गोदाम इन बाजारों में मौजूद है। पैदल चलना तक मुश्किल। यदि आग लगी, तो कितना नुकसान होगा, इसका अंदाजा लगना तक मुश्किल।


अंबाला छावनी के तंग बाजार
सौदागर बाजार- सन 1972 के बाद 2012 में फिर भीषण आग का मंजर देखा। बाजार की चौड़ाई सात फीट के करीब। लेकिन कारोबारियों ने दुकानों में बहुमंजिला करने में कसर नहीं छोड़ी। कमरों ही कमरों में बाजार और गोदाम। सारा माल ज्वलनशील ज्यादा। मोहन शू कंपनी की आग इसलिए काबू आई, क्योंकि ये प्रतिष्ठान मेन सड़क के किनारे पर था। गली के भीतर होता, तो 1972 वाला कांड फिर दोहराया जाता। इसमें पूरे बाजार की अधिकतर दुकानें ही जल गई थी।

पंसारी बाजार- बाजार में अधिकतर दुकान खाद्य पदार्थों व मसालों की। चौड़ाई पांच से छह फीट। बाजार में पैदल घुसना ही मुश्किल। दुकानों के ऊपर गोदाम। गलियों में बसा ये बाजार। आग लग जाए, तो जान आफत में आ जाए।

हनुमान मार्केट- छावनी की पुरानी मार्केट में से एक। अधिकतर दुकानें गारमेंट। चौड़ाई भले ही आठ फीट हो, मगर अतिक्रमण से ग्रस्त है बाजार। वाहन से घुस जाओ तो निकलना मुश्किल। गोदामों की संख्या भी ज्यादा। आगजनी हुई, तो काफी नुकसान होगा।

बजाजा बाजार की गलियां- बजाजा बाजार को छूने वाली गलियों में काफी संख्या में दुकानें हैं। ये दुकानें है गारमेंट और कॉस्मेटिक की। पैदल चलना तक मुश्किल। इन गलियों की चौड़ाई मुश्किल से पांच फीट। आग लग जाएं, तो बुझाने में छूटेंगे पसीने।

दुपट्टा बाजार-छावनी के पुराने बाजारों में से एक। चुनरी के दुपट्टों की अधिकतर दुकानें मौजूद है। एक बार एक ही वाहन आसानी से गुजर जाए, तो गनीमत। चौड़ाई करीबन छह फीट। सड़कों पर ही लोगों के काउंटर और कपड़े लटक रहे हैं। दुकानों के ऊपर रिहायश या गोदाम। मार्केट के अंदर ही एक और मार्केट। हालात यह कि इस तंग बाजार में आग लगी, तो बुझानी मुश्किल।

इसलिए होगा आग को बुझाना
जिला प्रशासन के दमकल विभाग के पास ऐसे कोई आधुनिक उपकरण नहीं है, जो इन तंगहाल गलियों नुमा बाजारों में घुसकर आग पर काबू पा सके। यदि कभी ऐसा हुआ, तो कई दुकानें भीषण आग की चपेट में आएंगी। इन बाजारों में आगजनी के वक्त पानी वाली दमकल की गाड़ियों के पाइपों को जितना लंबा कर आग लने वाली दुकान तक पहुंचाया जाएगा, तो पानी का प्रेशर उतना कम हो जाएगा। आग बुझाने में आएगी खासी परेशानी। कारोबारियों ने भी नहीं लगा रखे अग्निशमक यंत्र।

कारोबारियों को बनाएं जागरूक
समाज सेवी बीडी थापर, सुरेश शर्मा, प्रदीप खेड़ा व बृजलाल सिंगला कहते हैं कि जिला प्रशासन को तंग हाल बाजारों का मुआयना कर इस मसले को गंभीरता से लेना होगा। क्योंकि तंग हाल बाजारों में कपड़ों व कॉस्मेटिक की दुकानों में दिन के समय काफी संख्या में ग्राहक भी होते हैं। ऐसे में उनकी जान को भी आग से खतरा हो सकता है। इसलिए जिला प्रशासन कारोबारियों की बैठक ले और उन्हें इसके प्रति जागरूक बनाए, ताकि वे अपने प्रतिष्ठानों में अग्निशमक यंत्र रखे।
कोट
कई बाजार बहुत तंग हैं। ऐसे एडवांस उपकरण तो नहीं है। लेकिन क्या करें। ऐसे बाजारों में आगजनी के दौरान पानी का प्रेशर भी नहीं बन पाएगा। ये चिंता का विषय तो हैं। अब क्या किया जा सकता है।
-एके चोपड़ा, फायर अफसर, कैंट

ॅकोट
अधिकतर बाजार बहुत तंग हैं। कोशिश रहती है, लेकिन ऐसे बाजारों में आग पर काबू पाना मुश्किल। कारोबारियों को अग्निशमक यंत्र जरूर लगाने चाहिए। ताकि हो सके तो आग को शुरुआत में ही काबू किया जा सके। बाकी तो मौजूदा उपकरणों के ही सहारे हैं।
-शमशेर सिंह मलिक, फायर अफसर, सिटी
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