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जवानों की ‘मदद’ में आप भी बनें भागीदार

Ambala

Updated Fri, 07 Dec 2012 05:30 AM IST
अंबाला। भारत की थल, जल व वायु सेना सेना में रहकर अपने देश की सेवा करने वाले जवानों, शहीदों के आश्रितों और आर्थिक तंगी से गुजर रहे पूर्व सैनिकों की मदद के लिए आर्म्ड फोर्स फ्लैग डे के रूप में आजादी के बाद 07 दिसंबर 1949 को शुरू की गई खास मुहिम को आम जनता की बेहद दरकार है।
ये मुहिम प्रचार और प्रसार की वजह और लोगों की अनदेखी सेे डगमगा रही है। इस मुहिम में आज ज्यादा से ज्यादा लोगों के सहयोग की बहुत जरूरत है। यही वजह से यहां लोकल आर्मी अथारिटी और जिला सैनिक कल्याण बोर्ड लगातार लोगों को इस दिन के महत्व को समझाने में प्रयासरत है।
लोगों को बताया जा रहा है कि देश में आर्म्ड फोर्स फ्लैग डे यानी सशस्त्र सेना झंडा दिवस क्यों मनाया जाता है और इसका क्या उद्देश्य है? इसमें देश का नागरिक अपना क्या योगदान दे सकता है। सेना व जिला सैनिक कल्याण बोर्ड ही नहीं, बल्कि अंबाला की एक्स सर्विसमैन वेलफेयर एसोसिएशन भी इस दिवस की महत्ता को आम लोगों के बीच ले जाकर सेना के जवानों, शहीदों के आश्रितों और जरुरतमंद पूर्व सैनिकों की मदद के लिए उनकी भागेदारी सुनिश्चित करवाने का प्रयास कर रही है।
एसोसिएशन के प्रधान अतर सिंह मुल्तानी, खुशबीर सिंह दत्त, तेजिंद्र सिंह बिंद्रा, केएल भारद्वाज, नरेंद्र शर्मा, अजय सिंह सैनी, सुरेंद्र भाटिया, एचडी शर्मा के अनुसार आर्म्ड दिवस प्रचार और प्रसार की कमी की वजह से आम आदमी से अछूता है। इसलिए जरूरत है कि इस दिन की महत्ता को आम आदमी से जोड़ा जाए और इससे इकट्ठा होने वाले चंदे का सही इस्तेमाल किया जाए। उनके अनुसार जिला प्रशासन को इसमें अहम भूमिका निभानी होगी।


यह है इसका महत्व
आजादी के बाद भारतीय फौज तो तैयार हो गई। मगर जवानों, उनके परिजनों, शहीदों और उनके आश्रितों के वेलफेयर के लिए सरकार को फंड की कमी जूझना पड़ा। थल, वायु और नौ सेना तीनों में इस बात पर जोर दिया गया कि देश की सरहदों के प्रहरी जवानों, उनके परिजनों, शहीदों और उनके आश्रितों के लिए कल्याणकारी योजनाएं तैयार की जाएं, जिससे उन्हें इसका लाभ हो। लेकिन फंड की कमी के चलते 7 दिसंबर 1949 में तत्कालीन डिफेंस मिनिस्टर ने 7 दिसंबर को सशस्त्र सेना झंडा दिवस मनाने का निर्णय लिया। इस निर्णय के पीछे आम लोगों को छोटे-छोटे झंडे वितरित किए जाने थे और बदले में उनसे जवानों, शहीदों, उनके आश्रितों और रिटायर्ड होने के बाद जरूरतमंद पूर्व सैनिकों के लिए संबंधित व्यक्ति की सामर्थ्य के मुताबिक वित्तीय मदद एकत्रित करनी थी। ये परंपरा आज तक चल तो रही है, मगर ये अभियान आम आदमी से पूरी तरह जुड़ नहीं पाया। इसके माध्यम से एकत्रित राशि से कल्याणकारी योजनाओं को बजट उपलब्ध करवाया जाता है।

‘बहुत से पूर्व सैनिक ऐसे होते हैं, जो युद्ध के दौरान डिसेबल हो जाते हैं, कई जवानों का परिवार आर्थिक तंगी से गुजर रहा होता है। इसलिए उनके आश्रितों के लिए इस दिन भारतीय झंडा लोगों को देकर उनसे चंदा एकत्रित किया जाता है। विभिन्न जगहों पर डोनेशन बाक्स रखे जाते हैं। या लोग सीधे जिला सैनिक बोर्ड कार्यालय में भी अपनी स्वैच्छिक डोनेशन दे सकते हैं। आम आदमी को इस मुहिम से जुड़ना चाहिए।
- जय सिंह फोगाट, सचिव, जिला सैनिक कल्याण बोर्ड, अंबाला
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