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तलाशः झूठे हो जाएंगे आपके सारे अंदाज

रोहित मिश्र

Updated Fri, 30 Nov 2012 04:55 PM IST
talash- all the assumption will false
'तलाश' फिल्म के क्लाइमेक्स पर चौंक सकते हैं, उत्साहित हो सकते हैं पर साथ-साथ निराश होने का भी डर है। आपका रिक्‍शन 'अरे! यह कैसे हो सकता है' जैसा भी कुछ हो सकता है। यह क्लाइमेक्स की बात है जिसे हर कोई अपने-अपने तरीके से इंटरप्रिटेट करेगा। बात उस क्लाइमेक्स की पहले की। यह एक सधी हुई सस्पेंस फिल्म है। आपको बांधकर रखती
है।

अपनी मेकिंग और प्रजेंटेशन के साथ अपनी कहानी से भी। दूसरी सस्पेंस थ्रिलर फिल्मों की तरह 'तलाश' में अचानक से तेज आवाज निकालकर या कैमरे के कुछ प्रयोगों से डराने का प्रयास नहीं किया गया है। यह रहस्य कहानी का हिस्सा है, जिसकी गिरफ्त में हम धीमे-धीमे फंसते हैं। कहानी में न तो बहुत उतार-चढ़ाव हैं न ही फ्लैशबैक।

कुछ छोटे-छोटे फ्लैशबैक जरूर हैं जिन्हें गानों के साथ निकाल दिया गया है। अलग से कहानी फ्लैशबैक में नहीं जाती है। 'तलाश' दर्शक की वह सारी अपेक्षाएं पूरी करती है जिनको लिए हम हॉल में दाखिल होते हैं।

कहानी
रात के तीन बजे मुंबई में एक कार खाली सड़क को छोड़कर, बैरीकेटिंग तोड़ती हुई समुद्र में जा समाती है। यह मुंबई का रेड लाइट इलाका है। दुर्घटना में मरने वाला हिंदी फिल्‍म का स्टार है। इस दुर्घटना की जांच का जिम्मा इंस्पेक्टर सुरजन शेखावत (आमिर खान) को मिलता है। यह घटना कई रहस्य समेटे हुए हैं।

पहली यह कि मरने वाला उस समय रेड लाइट इलाके में क्या कर रहा होता है जबकि वह इलाका न तो उसके ऑफिस के रास्ते में पड़ता है न ही घर के। दूसरी बात यह कि मरने से पहले उसने अपने अकांउटेंट से 20 लाख रूपए कैश क्यों लिए होते हैं। तीसरी बात यह कि उस सूनी सड़क में उसे अचानक एकदम गाड़ी को समंदर की ओर क्यों मोड़नी पड़ती है।

इन सारे सवालों के तफशीश जब शुरू होती है तो कई सारे नए पात्र और घटनाएं फिल्म में शामिल हो जाती हैं। एक उलझन खोलते-खोलते कोई नई गांठ मिल जाती हैं। घटना की जांच करने वाले आमिर अपने मर चुके बेटे को लेकर एक मनोवैज्ञानिक पछतावे में जी रहे होते हैं। इस बात को लेकर उनकी अपनी पत्नी रोशनी(रानी मुखर्जी) से तनाव की स्थितियां बनी होती हैं। उस कार दुर्घटना और बच्चे के मरने में भी कुछ स्थितियां कॉमन बनती हैं।

गुत्‍थी को सुलझाने में आमिर को रोजी (करीना कपूर) की मदद मिलती है। अचानक जब गुत्‍थी सुलझने को होती है तो एक रहस्य खुलता है जिस पर हम सोच भी नहीं रहे होते हैँ। उस एक रहस्य को खुलने के बाद पिछली हुई सारी बातें-बातें परत दर परत बिना बताए समझ आ जाती हैं। तलाश इसी 'रहस्य' का है।

अभिनय
यह पूरी तरह से आमिर खान की फिल्‍म है। फिल्म में उन्होंने एक बार थप्पड़ मारा है और एक ही बार वह तेज आवाज में बोले हैं। बावजूद इसके वह इंस्पेक्टर के रोल में अच्छे लगते हैं। आमिर की अपनी अभिनय की स्टाईल है। रोने की, भावुक होने की और गुस्सा और खुश होने की। कुछ उन्हीं पोस्चर्स के साथ आमिर इस फिल्म में भी रहते हैं।

आमिर के हिस्से इस फिल्म में बहुत अच्छे संवाद नहीं आए हैं। शायद यह रोल की डिमांड रही हो। वह चुप रहकर अंदर ही अंदर खुद से बात करने वाले इंसान के रूप में दिखाए जाते हैँ। इस भूमिका को उन्होंने अच्छे से जिया है। आमिर की पत्नी का रोल निभा रहीं रानी मुखर्जी अपने रोल के मुताबिक हैं। उन्हें ऐसी मां का किरदार निभाना था जिसका 10 साल का बेटा मर चुका होता है। एक बेटे की मौत के गम में एक मां जैसी जिंदगी जीती है रानी ने वैसी जिंदगी पर्दे पर सहजता से जी है।

फिल्म में किरदार के अनुरूप सिर्फ करीना नहीं लगी हैं। उनकी जो इमेज दर्शकों के मन में बैठी है वह उन्हें कॉलगर्ल रोजी मानने के लिए तैयार नहीं होती। उनके हर सीन को देखकर लगता है कि वह कॉलगर्ल नहीं बल्कि कॉलगर्ल होने का अभिनय कर रही हैं। 'लव सेक्स और धोखा', 'शैतान' और 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के बाद 'तलाश' में राजकुमार यादव को देखकर लगता है कि वह हर दिन बेहतर होते जा रहे हैं। नवाजुद्दीन सिद्की की फिल्म में जितनी भूमिका थी उसके साथ उन्होंने अच्छा ही किया है। रोज-रोज 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' जैसी फिल्में नहीं मिलती।

निर्देशन/पटकथा
फिल्म का निर्देशन रीमा कागती ने किया है। इस‌की पटकथा उन्होंने जोया अख्तर के साथ मिलकर लिखी है। जोया इसके पहले 'लक बाय चांस' और 'जिंदगी न मिलेगी दोबारा' की पटकथा लिख चुकी हैं। फिल्म की पटकथा में एक बात साफ है कि इसमें फॉर्मूलों से दर्शकों को बांधने या डराने का प्रयास नहीं किया गया है। सब कुछ बहुत सहजता के साथ होता चलता है।

ऐसे जॉनर की फिल्मों में अंत के कुछ मिनट बहुत तेज होते हैं। वहां इस बात की परीक्षा होती है कि दर्शक फिल्‍म को कितना दिमाग लगाकर देख रहा होता है। इस मामले में थोड़ा खालीपन दिखता है। 'तलाश' फिल्म के संवाद बहुत प्रभावित नहीं करते, साथ ही फिल्म कहीं-कहीं कुछ ठहरी दिखती है।

मूल कथा के साथ जिस कहानी को समांतर चलाने का प्रयास किया गया वह कहानी भावुक होने की बावजूद अपील नहीं करती। रीमा कागती का निर्देशन अच्छा है। फिल्म को शूट करने में उन्होंने लाइटिंग, कैमरे और लोकेशन का फिल्म की थीम के अनुरूप इस्तेमाल किया है।

संगीत
इस फिल्‍म को संगीत दे रहे राम संपत में इस बार 'देल्ही बेली' वाली मौलिकता और चुटीलापन नहीं दे पाए हैं। जावेद अख्तर के लिरक्सि भी वैसी कोई ताजगी नहीं जगाते। 'तलाश' के यह गाने देखने के साथ सुनने में अच्छे लग सकते हैं पर शायद सिर्फ सुनने में यह उतने बेहतर न लगे।

गाना 'मुस्काने झूठी हैं' से सुमन श्रीधर वैसा प्रभावित नहीं करतीं जैसा कि 'शैतान' फिल्म के गाने 'हवा-हवाई' से दर्शक प्रभावित हुए थे। फिल्म का सबसे अच्छा गाना 'जी ले जरा' ही है। इस फिल्माया भी बेहतरीन तरीके से गया है। फिल्म का संगीत, फिल्म जितना ही शायद ही याद रखा जाए।

फिल्म क्यों देखें
ऐसी सस्पेंस फिल्म के लिए जिसमें आप अंदाजा नहीं लगाते, क्योंकि अभी तक के सारे अंदाजे गलत हो चुके होते हैं। एक परफेक्ट इंटरनेटर फिल्म के लिए जिसे एक बार जरूर देखा जाना चाहिए।

और क्यों न देखें
यदि आपको ऐसी फिल्में पसंद हो जिसमें आप अपना दिमाग न लगाना चाहें। जिसमें आपको पता चल जाता है या तो इसकी शादी इससे नहीं होगी तो उससे होगी ही। बात खत्म।
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