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डार्क नाइट राइज़ेज

Radha Krishna

Radha Krishna

Updated Thu, 09 Aug 2012 12:03 PM IST
film review the dark knight rises
लोगों की उम्मीदें बहुत ज्यादा थीं। जब रिडले स्कॉट और जेम्स कैमरॉन जैसे दिग्गज निर्देशक भी दर्शकों को कोई नया अनुभव नहीं दे पा रहे हैं, तो सबकी निगाहें क्रिस्टोफर नोलन की 'डार्क नाइट राइज़ेज' पर टिक गईं। यह कहना गलत नहीं होगा कि क्रिस्टोफर नोलन इस बार भी उन उम्मीदों पर खरे उतरे, जो उन्हें द डार्क नाइट और इंसेप्शन से जगाई थीं।
नोलन ने अपने जादुई स्पर्श से एक सुपरहीरो कथा को न सिर्फ एपिक में बदल दिया, बल्कि फिल्म के जरिए कई विचारोत्तेजक मुद्दों को छेड़ते गए। उन्होंने इस भव्य काल्पनिक फिल्म को एक गहरा राजनीतिक अर्थ दिया है। इसके संदर्भ हम तात्कालिक राजनीतिक घटनाओं से तो जोड़ ही सकते हैं, यह पश्चिमी सभ्यता के संकट पर एक दार्शनिक टिप्पणी भी बन जाती है।

कहानी
फिल्म की शुरुआत ही एक निराशा में डूबे वातावरण से होती है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उदासी का यह रंग गहरा होता जाता है। स्मार्ट और रंगीन-मिज़ाज दिखने की बजाय अधेड़ और थका हुआ ब्रुस वेन सामने आता है। जिसके पास सिर्फ अतीत की कुछ कड़वी यादें हैं। वहीं करीब सात सालों से ब्रुस वेन का दूसरा रूप यानी सुपरहीरो बैटमैन गोथम शहर से गायब है।

मगर परिस्थितियां कुछ इस तरह करवट लेती हैं कि बैटमैन को वापस लौटना पड़ता है। जबकि हालात बहुत कठिन हैं, वह चारों तरफ से शत्रुओं से घिरा है। बैटमैन पहले की तरह शारीरिक रुप से मजबूत नहीं रहा, पुलिस उसके पीछे पड़ी है और उसके दुश्मन भी पहले से ज्यादा ताकतवर हो चुके हैं।

शुरुआती संघर्ष में बैटमैन को पराजय हाथ लगती है। एक के बाद एक ब्रुस वेन का सब कुछ छिनता चला जाता है और उसे मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। शहर तबाही के मुहाने पर खड़ा होता है। बस, इसके आगे की कहानी का सारा रोमांच यही है कि जीत के लिए असंभव सी दिखने वाली इन परिस्थियों के बीच कैसे बाजी पलटती है।

निर्देशन
क्रिस्टोफर नोलन पर्त-दर-पर्त कहानी बुनने के मास्टर हैं। 'मेमेंटो' और 'इंसेप्शन' में उन्होंने यह कमाल दिखाया है। इस फिल्म के क्लाइमेक्स में उनका यह हुनर दिखता है। फिल्म को भव्य बनाने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी है। इसके लिए सिर्फ आइमैक्स कैमरे का इस्तेमाल नहीं किया गया बल्कि कहानी की भव्यता और मजबूत चरित्र चित्रण पर भी ध्यान दिया गया है।

नोलन अन्य निर्देशकों के मुकाबले स्पेशल इफेक्ट्स के कम से कम इस्तेमाल पर यकीन रखते हैं। यही कारण है कि उनकी फिल्मों के ऐक्शन सीन ज्यादा वास्तविक और रोमांचक लगते हैं। फिल्म के कई ऐक्शन सीन नोलन के निर्देशकीय कौशल का उदाहरण हैं, जैसे पुलिस वालों और अपराधियों का खुली सड़क पर भिड़ना या सुरंग के भीतर बैटमैन और बेन की रोमांचक हाथापाई।

नोलन शायद इस फिल्म के जरिए यह बताना चाहते हैं कि क्रांति की आड़ में अक्सर एक डिक्टेटर का चेहरा छिपा होता है। उन्होंने पश्चिमी समाज को उसके भयावह भविष्य का आइना दिखाने की कोशिश की है या दूसरे शब्दों में कहें तो पश्चिमी समाज के भीतर छिपे भय को एक काल्पनिक शहर गोथम का रूपक बनाकर पेश कर दिया है।

अभिनय
डार्क नाइट के जोकर (हीथ लेज़र) की तरह नोलन यहां भी एक इंटैलेक्चुअल खलनायक बेन (टॉम हार्डी) को पेश करते हैं। वह सिर्फ शरीर से ताकतवर नहीं है- उसकी सबसे बड़ी ताकत है दु:साहस और ऐसा आत्मविश्वास जिसके दम पर वह गलत चीजों को भी सही ठहरा देता है। उसमें तमाम तानाशाहों की तरह भीड़ को बरगलाने की क्षमता है। चेहरा ढका होने के बावजूद हार्डी अपनी शारीरिक भंगिमाओं और आवाज से दहशत पैदा करने में कामयाब रहे।

क्रिश्चियन बेल ने तो ब्रुस वेन के किरदार के जरिए अपने अभिनय को एक कविता में बदल दिया है। खास तौर पर शुरुआती दृश्यों में उनके चेहरे से टपकती गहरी हताशा अद्भुत है। वहीं एनी हैथवे ने कैट वुमेन के रहस्यमय किरदार को अपने चेहरे की पल-पल बदलती भाव-भंगिमाओं से जीवंत कर दिया है।

इसे भी नोलन की खूबी कहेंगे कि फिल्म का छोटा से छोटा किरदार भी याद रह जाता है। वे चरित्र की बारीकियों पर काफी ध्यान देते हैं। यही वजह है कि चाहे वह युवा अफसर हो, कमिश्नर गार्डन हों या फिल्म में सिर्फ दो बार झलक दिखलाने वाला एक छोटा बच्चा- इन्हें भुलाना मुश्किल है।

डॉयलाग
हॉलीवुड की किसी डब फिल्म में शायद ही इतने शानदार डॉयलाग सुनने को मिलें, जितनी बेहतरीन भाषा में डार्क नाइट राइज़ेज के डब किए हुए हिन्दी के संवाद लिखे गए हैं, बॉलीवुड में भी आजकल ऐसे डॉयलाग नहीं सुनाई देते। विद्रोही, दिलेर और सेक्सी कैट वुमन ब्रुस वेन से कहती है, "जब तुम हँस-हँस कर जी रहे थे, तब हम मर-मर के जी रहे थे।"

वहीं जब बेन अपने विनाशकारी कारनामों को अंजाम दे रहा होता है तो उसका यह डॉयलॉग फिल्म को एक गहरी मीनिंग दे जाता है, "मैं चाहता हूं कि वो पश्चिमी सभ्यता के आने वाले युग को अनुभव करें..." दूसरी तरफ कमिश्नर गॉर्डेन का यह डॉयलाग भी लोगों को लंबे समय तक याद रहेगा, "...ऐसा दोस्त, जो बुराई के कीचड़ में अपने हाथ गंदे करे, ताकि तुम अपने हाथ साफ रख सको।"

कुछ और शानदार संवादों का अंदाज देखें, "अंधेरे में मासूमियत का चिराग़ नहीं जल सकता, उसे बुझाना ही पड़ता है।" या फिर, "बैटमैन! तुमने अंधेरों से सिर्फ दोस्ती की है, मैं इन अंधेरों में जन्मा हूं।" एक चौंकाने वाले मोड़ पर हम यह डॉयलाग सुनते हैं, "वो ख़ंजर जो सालों तक इंतज़ार करता है और चुपके से अंतड़ियों में उतर जाता है, वो ख़ंजर शायद सबसे गहरा ज़ख्म देता है।"

अंत में बैटमैन का यह डॉयलाग तो शायद पूरी फिल्म का निचोड़ बन जाता है, "हीरो कोई भी बन सकता है, एक आम इंसान भी, जो किसी अनाथ बच्चे के कंधों पर कोट उढ़ा सके, ताकि उसे लगे कि उसकी दुनिया अभी भी सलामत है।"

एक्स्ट्रा शॉट्स
अभिनेता और ऐंकर मोहन कपूर ने फ़िल्म के हिंदी संस्करण में खलनायक बेन को आवाज़ दी है। इसके लिए मोहन कपूर को विशेष ट्रेनिंग दी गई क्योंकि बेन का किरदार निभा रहे टॉम हार्डी ने पूरी फिल्म में मुखौटा पहन रखा है।

क्रिस्टोफर नोलन ने इस फिल्म के दृश्यों को और बेहतर बनाने के लिए आइमैक्स कैमरों का इस्तेमाल किया है। यह पहली बार है कि किसी फिल्म के बड़े हिस्सों को आइमैक्स कैमरे के साथ शूट किया गया हो।

इस फिल्म की शूटिंग भारत समेत कई देशों में हुई है। प्रमुख स्थान हैं- अमेरिका के न्यूयार्क और लॉ़स एंजेल्स, इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुछ शहर और भारत की जोधपुर सिटी। हालांकि फिल्म में भारत के किसी भौगोलिक स्थल का जिक्र नहीं है।

कहानी का ताना-बाना बैटमैन सिरीज की तीन कॉमिक्सों पर आधारित है, जिनके टाइटल हैं- 'नाइटफॉल', 'द डार्क नॉइट रिटर्न्स' और 'नो मैन्स लैंड'।

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