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फिल्म समीक्षाः गैंग्स आफ वासेपुर-II

Radha Krishna

Radha Krishna

Updated Thu, 09 Aug 2012 11:40 AM IST
film review gangs-of-wasseypur-2
गैंग्स आफ वासेपुर पार्ट-II को अगर सही मायनों में किसी ने दिलचस्प बनाया है तो वो हैं फैज़ल खान के किरदार में नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी ने। दूसरा भाग पूरी तरह से उन्हीं के कंधों पर है और मनोज बाजपेई के मुकाबले सिद्दीक़ी ने फिल्म को ज्यादा ताजगी दी है।
अनुराग कश्यप ने उनके कैरेक्टर को एक रियलिस्टिक जामा पहनाने में भले ही मदद की हो मगर यह सिद्दीक़ी की खूबी है कि वे अपने अभिनय के दम पर उस चरित्र को एक काव्यात्मक ऊंचाई देते हैं। कुल मिलाकर अगर पहला भाग आपके मन को भाया तो दूसरा पार्ट देखने भी बेहिचक जाएं। बस इतना ध्यान रखें कि इस हिस्से में खून-खराबा पहले से भी ज्यादा है।

कहानी
इस हिस्से में सरदार खान की मौत के बाद की घटनाओं को समेटा गया है। जैसा कि पहले भाग में दिखाया गया था फिल्म की शुरुआत खान फैमली के घर पर हमले से शुरु होती है। इसके बाद पूरी कहानी फ्लैशबैक में चलती है। फिल्म के इस हिस्से में दर्शक वापस उसी मोड़ पर आते हैं। पिछले भाग की तरह इस बार भी दो गुटों के बीच छोटे-छोटे टकरावों में फिल्म की कहानी घूमती रहती है।

इस हिस्से में यह देखना दिलचस्प है कि कैसे बदलते समय के साथ-साथ वासेपुर के माफिया भी अपने तौर-तरीके बदलने लगे। इस कड़ी का सबसे बड़ा आकर्षण यह देखना है कि कैसे एक गांजा पीने वाला, सबसे नाकार समझा जाने वाला एक आवारा सा लड़के से पूरा वासेपुर थर्राने लगता है और दो पीढ़ियों के बाद अंत में वही रामाधीर सिंह से सही मायनों में टक्कर ले पाता है।

इस फिल्म की सबसे खटकने वाली कमी यह है कि इतनी लंबी तीन पीढ़ियों की कहानी को समेटने वाली फिल्म को अनुराग कश्यप सही मायनों में एक एपिक का दर्जा नहीं दे सके। फिल्म दो गुटों के बीच लड़ाई-झगड़े में ही भटकती रह जाती है। हर कैरेटक्टर को रियलिस्टिक टॅच देने में वे उन्हें पर्याप्त गहराई न दे सके। जिन लोगों ने अपनी छाप छोड़ी वह उनके अभिनय का कमाल है, पटकथा में उनके लिए बहुत कम गुंजाइश थी।

निर्देशन
इसमें कोई शक नहीं कि अनुराग कश्यप ने पहली बार हिन्दी सिनेमा के दर्शकों का एक अलग दुनिया से परिचय कराया है। सब कुछ वास्तविकता के काफी करीब है। लोगों का बर्ताव, उनके आपसी रिश्ते, वातावरण, लोकेशन- इसे सिनेमा के पर्दे पर इतनी बारीकी से प्रस्तुत करना एक मुश्किल काम था, जो अनुराग ने बखूबी किया।

दूसरे भाग में भी काफी हिंसा है। काफी गोलियां चलीं और काफी खून भी बहा है। अनुराग चाहते तो इसे कम करके भी कहानी को बेहतर ढंग से कह सकते थे। इसकी वजह से फिल्म के बहुत से अहम हिस्सों का प्रभाव कम हो जाता है। फिल्म का अंत भी बहुत प्रभावशाली नहीं बन पाया है।

संगीत
इस बार भी कहानी संगीत की मदद से आगे बढ़ती है। मगर इसमें दो ही गीत "तार बिजली से पतले..." और "काला रे..." याद रह जाते हैं। पहले भाग के आरंभ में सुनाई देने वाला गीत "इक बगल में चाँद होगा, इक बगल में रोटियां..." फिल्म के अंत में फिर सुनाई देता है और कहानी की थीम से मार्मिक ढंग से जुड़ता है।

क्यों देखें
अगर 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' का पहला भाग पसंद आया हो। इसके अलावा यह फिल्म नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी और ज़िशान क़ुरैशी के शानदार अभिनय के लिए भी देखी जानी चाहिए। यह फिल्म माफिया, गुंडे, पुलिस और राजनीति के गठजोड़ पर कोई टिप्पणी किए बगैर उसकी समझ पैदा करती है।

क्यों न देखें
अगर किसी वजह से पहला भाग देखने से चूक गए हों, क्योंकि पहले हिस्से के संदर्भों के बिना फिल्म बिल्कुल समझ में नहीं आएगी। अगर आपको हिंसा और गालियों से परहेज है तो इस फिल्म से दूर रहें।

बैनर: वायकॉम 18 मोशन पिक्चर्स
निर्माता: अनुराग कश्यप, सुनील बोहरा, गुनीत मोंगा
निर्देशक: अनुराग कश्यप
संगीत: स्नेहा खानवलकर
कलाकार: मनोज बाजपेयी, नवाजुद्दीन सिद्दकी, पियूष मिश्रा, रीमा सेन, जयदीप अहलावत, रिचा चड्ढा, हुमा कुरैशी, राजकुमार यादव, तिग्मांशु धुलिया
रे‌टिंग: ***1/2

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