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पांच साल बाद किया था पिता का अंतिम संस्कार: गुलजार

नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क

Updated Mon, 12 Nov 2012 02:11 PM IST
 gulzaar cremated father after 5 years
गीतकार-शायर-फिल्मकार गुलजार की जिंदगी का नया पन्ना खुला है। एक किताब में उन्होंने इस बात का खुलासा किया है कि वह अपने पिता के अंतिम संस्कार में शरीक नहीं हो सके थे और वर्षों तक यह टीस उन्हें सालती रही। आखिरकार पांच साल बाद फिल्मकार बिमल रॉय के अंतिम संस्कार के साथ उन्होंने अपने पिता को भी ‘आखिरी विदाई’ दी थी। यह यकीन किया था कि पिता अब दुनिया में नहीं रहे।
पत्रकार जिया उस-सलाम की पुस्तक ‘हाउसफुल : द गोल्डन इयर्स ऑफ बॉलीवुड’ में गुलजार ने मन के पन्ने खोलते हुए कहा, ‘जब दिल्ली में मेरे पिता का निधन हुआ, मैं मुंबई में बिमल दा के सहायक के रूप में काम कर रहा था। मेरे परिवार ने मुझे खबर नहीं दी। मेरे बड़े भाई मुंबई में ही रहते थे और पिता के न रहने की खबर पाकर फ्लाइट से उसी दिन निकल गए।’ गुलजार के अनुसार, ‘कुछ दिनों बाद दिल्ली में हमारे एक पड़ोसी ने मुझे पिता की खबर दी। मैं तत्काल ट्रेन पकड़ कर भागा। उन दिनों फ्रंटियर मेल दिल्ली के लिए सबसे तेज ट्रेन थी, जो 24 घंटे में पहुंचाती थी। जब तक मैं घर पहुंचा सब निपट चुका था।’

गुलजार को अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल न होने का दुख सदा परेशान करता रहा। उन दिनों वे मुंबई में संघर्ष कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘मैं दिल में खालीपन लिए लौटा। मैं पिता के अंतिम संस्कार में नहीं था। इसलिए वह मेरे लिए मर कर भी जिंदा थे। मेरे दिल पर एक भार था।’ गुलजार ने बताया, ‘पांच साल बाद बिमल दा कैंसर से लड़ रहे थे। मैं हर रात उनके पास बैठ कर रोता था। उनकी पसंदीदा स्क्रिप्ट ‘अमृत कुंभ’ पढ़कर सुनाता। आठ जनवरी, 1966 को जब उनका निधन हुआ, तो हमने उनका अंतिम संस्कार किया और उनके साथ ही मैंने अपने पिता को भी अंतिम विदाई दी। उनका ‘अंतिम संस्कार’ किया।’

76 वर्ष के गुलजार ने फिल्म ‘बंदिनी’ (1963) में सबसे पहले बिमल रॉय के साथ काम किया था। उनका पहला गीत था ‘मोरा गोरा रंग...’। गुलजार की इच्छा थी कि वह खुद यह गीत बिमल रॉय को सुनाएं, लेकिन संगीतकार एसडी बर्मन ने रोक दिया था। उन्हें डर था कि कहीं गुलजार की आवाज और अंदाज में यह गीत सुनकर बिमल रॉय का मूड न बिगड़ जाए।
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