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जानिये, अखाड़ों के बारे में

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विजय जैन/इलाहाबाद

Updated Thu, 27 Dec 2012 04:02 PM IST
history of akhada
महाकुंभपर्व के वक्त शाहीस्नान के लिए आने वाले दसनाम संन्यासी, साधू और महंतों के अखाडे़ हैं। उनका परिचय तीर्थ, आश्रम, सरस्वती, भारती, गिरी, पुरी, वन, पर्वत और सागर इनसे होता था। एक जमाने में यह सब संघटित थे परंतु मतभेद के कारण इन अखाड़ों में बंटवारे हो गए। अभी अखाडे़ इस प्रकार हैं।
श्री निरंजनी अखाड़ा
यह अखाड़ा संवत 160 सन् 826 सांमवार रोजी मांडवी (कच्छ) को यहां स्थापित हुआ। इनके इष्ट देव ''कार्तिकस्वामी'' हैं। इनमें नियमबध्द नागे(दिगंबर), साधु, मंहत व महामंडलेश्वर की संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाएं प्रयाग (अलाहाबाद), हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर तथा ओकांरेश्वर, उदयपुर व ज्वालामुखी में हैं। उनके स्नान का समय पहली भोर होते ही होता है।

श्री जूनादत्त(भैरव) अखाड़ा
यह अखाड़ा संवत 1202 सन् 1069 में यहां स्थापित हुआ। इनके इष्ट देव ''श्री. रुद्रावतार दत्तात्रय'' हैं। इनमें नियमबध्द नागे(दिगंबर), साधु, मंहत व महामंडलेश्वर इनकी संख्या ज्यादा है तथा इनमें अवधुतानिया भी होते हैं। उनकी शाखाएं प्रयाग (इलाहाबाद), हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर, काशी व ओकांरेश्वर यहा है। उनके स्नान का समय पहली भोर होते ही होता है।

श्री महानिर्वाणी अखाड़ा
यह अखाड़ा संवत 805 सन् 671 मध्ये मार्गशीर्ष शुध्द दशमीस झारखंड वैजनाथ धाम (बिहार) प्रांत में स्थापित हुआ। इनके इष्ट देव ''श्री कपिल महामुनी'' हैं। इनमें नियमबध्द नागे(दिगंबर), साधु, मंहत व महामंडलेश्वर इनकी संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाएं प्रयाग (अलाहाबाद), हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर, ओंकारेश्वर व कनखन में हैं। उनके स्नान का समय पहली भोर होते ही होता है।

श्री अटल अखाड़ा
यह अखाड़ा संवत 706 सन् 569 मध्ये मार्गशीर्ष शुध्द चतुर्थीस गोंडवन में स्थापित हुआ। इनके इष्ट देव ''श्री गजानन'' (गणपती) हैं। इनमें नियमबध्द नागे(दिगंबर), साधु, मंहत व महामंडलेश्वर इनकी संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाएं प्रयाग (अलाहाबाद), हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर, काशी आजर व बड़ोदा में है। उनके स्नान का समय पहली भोर होते ही होता है।

श्री आवाहन अखाड़ा
यह अखाड़ा संवत 603 सन् 469 मध्ये ज्येष्ठ नवमीस में स्थापित हुआ। इनके इष्ट देव ''श्री. दत्तात्रेय '' व ''श्री गजानन'' हैं। यह अखाड़ा पुराना दत्त अखाड़ा के साथ ही रहता है। इनका केंद्रस्थान ''काशी'' है। उनकी शाखाएं प्रयाग (अलाहाबाद), हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर में हैं। उनके स्नान का समय पहली भोर होते ही होता है।

श्री आनंद अखाड़ा
यह अखाड़ा संवत 912 सन् 778 मध्ये ज्येष्ठ में स्थापित हुआ। इनके इष्ट दैवत ''श्री. अग्नि '' व ''श्री सूर्यनारायण'' हैं। यह अखाड़ा निरंजनी आखाड़ा के साथ ही रहता है। इनमें नियमबध्द नागे, साधु मंहत व महामंडलेश्वर इनकी संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाएं प्रयाग (अलाहाबाद), हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर में है। उनके स्नान का समय पहली भोर होते ही होता है।

श्री पंच अग्नि अखाड़ा
यह अखाड़ा सन् 1058 मध्ये आषाढ़ शुध्द एकादशीस में स्थापित हुआ। इनकी इष्ट देव ''गायत्री'' हैं। इनका प्रधान केंद्र ''काशी'' है। इनमें चारही पीठों के शंकराचार्य, ब्रम्हचारी, साधु व महामंडलेश्वर इनकी संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाएं प्रयाग (अलाहाबाद), हरिद्वार, उज्जैन व त्र्यंबकेश्वर में हैं। उनके स्नान का समय पहली भोर होते ही होता है।

श्री नागपंथी गोरक्षनाथ अखाड़ा
यह अखाड़ा संवत 900 सन् 866 मध्ये त्र्यंबकेश्वरी अहिल्या - गोदावरी संगम पर स्थापित हुआ। इनके संस्थापक पीर शिवनाथजी हैं उनका मुख्य दैवत ''गोरक्षनाथ'' है और इनमें बारा पंथ हैं। यह सांप्रदाय योगिनी कौल नामसे प्रसिध्द इनकी त्र्यंबंकेश्वर शाखा ''त्र्यंबकं मठिका'' नामसे प्रसिद्घ है। इसके अलावा राजामठकद्री (म्हैसुर) यहां भी शाखा है।

श्री वैष्णव अखाड़ा
यह बालानंद अखाड़ा संवत 1729 सन् 1595 मध्ये दारागंज येथे ''श्री मध्यमुरारी'' में स्थापित हुआ। समय के साथ इनमें निर्मोही, निर्वाणी, खाकी आदी तीन सांप्रदाय स्थापित हुए। इनका शाही स्नान दशनामी सांधु के स्नान के बाद होता है। इनका अखाड़ा त्र्यंबकेश्वर में मारूती मंदिर के पास था। सन् 1848 तक शाहीस्नान त्र्यंबकेश्वर में ही हुआ करता था परंतु सन् 1848 में ''शैव'' व ''वैष्णव'' साधुंओं में पहले स्नान कौन करे इस मुद्दे पर झगडे़ हुए। झगड़ा इतना बढ़ा कि 18000 साधुओं की हत्या कर दी गई। श्रीमंत पेशवाजी ने यह झगड़ा मिटाया। उस समय उन्होंने त्र्यंबकेश्वर के नजदीक 'चक्रतिर्थापर' स्नान किया। 1932 से वह नाशिक में स्नान करने लगे। आज भी यह स्नान नाशिक में ही होता है।  

श्री उदासिन पंचायती बड़ा अखाड़ा
यह अखाड़ा संवत 1844 सन् 1910 में स्थापित हुआ। इस सांप्रदाय के संस्थापक श्री चंद्रआचार्य उदासिन हैं। उनमें सांप्रदायिक भेद है। इनमें उदासिन साधु, मंहत व महामंडलेश्वर इनकी संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाएं शाखा प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर, भदैनी, कनखन, साहेबगंज मुलतान, नेपाल व मद्रास (चेन्नई) में है। इनका शाही स्नान सूर्योदय के पश्चात होता है।

श्री उदासिन नया अखाड़ा
यह अखाड़ा संवत 1902 सन् 1710 में स्थापित हुआ। इसे बड़ा उदासिन अखाड़ा के कुछ सांधुओं ने विभक्त होकर स्थापित किया। इनके प्रवर्तक ''मंहत सुधीरदासजी'' थे। इनमें नया उदासिन आखाडयाचे सांप्रदायी साधु, महंत, व महामंडलेश्वर इनकी संख्या ज्यादा है। उनकी शाखाएं प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर में है। इनका शाही स्नान सूर्योदय के पश्चात होता है।

श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा
यह अखाड़ा संवत 1918 सन् 1784 में स्थापित हुआ। 1784 में हरिद्वार कुंभमेला के समय एक बड़ी सभा मे विचार विनिमय करके ''श्री दुरगाहसिंह महाराज'' ने इसकी स्थापना की। इनके इष्टदेव ''श्री गुरूनानक ग्रंथसाहिब'' हैं। इनमें सांप्रदायी साधु, मंहत व महामंडलेश्वर इनकी संख्या बहुत है। उनकी शाखाएं प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, त्र्यंबकेश्वर में है। इनका शाही स्नान उदासिन अखाड़ा के शाही स्नान के बाद सबसे अंत में होता है।
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